झाड़ू से जुड़ी गुलामी

संपादकीय 
16 जून 2025
 *झाड़ू से जुड़ी गुलामी* 
 *"सफाई कर्मचारियों की सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने का समय"* 


भारत की सफाई व्यवस्था को कायम रखने वाले सफाई कर्मचारी लंबे समय से उपेक्षा, असमानता और अपमान की सलीब पर लटकते आ रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनकी बदौलत नगरों की सड़कों पर चलना संभव है, अस्पताल संक्रमण से बचते हैं, और सार्वजनिक जीवन साफ-सुथरा दिखाई देता है। लेकिन क्या इनका श्रम उन्हें वह सम्मान और गरिमा दिला पाया, जिसके वे हकदार हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज भी इस पेशे को समाज में जिस नजर से देखा जाता है, वह जातीय और सामाजिक अन्याय का गहरा आईना है। सदियों पहले की सड़ी-गली व्यवस्था के तहत सफाई का कार्य कुछ विशेष जातियों के माथे मढ़ दिया गया, और आधुनिक भारत में भी वे उसी कार्य में फंसे हुए हैं। सवाल यह नहीं है कि सफाई क्यों जरूरी है, सवाल यह है कि यह काम सिर्फ उन्हीं जातियों के लिए क्यों जरूरी बना दिया गया है?
सफाई का कार्य आज “पेशा” नहीं, बल्कि जन्म के आधार पर थोपा गया एक सामाजिक दंड बन चुका है। हजारों परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इस कार्य में उलझे हुए हैं, क्योंकि समाज और शासन—दोनों ने उन्हें वैकल्पिक विकास की दिशा कभी दिखाने की कोशिश नहीं की। सरकारी नौकरियों की सूची में सफाई कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए खुले तौर पर सिर्फ उन्हीं जातियों को पात्र माना जाना एक प्रच्छन्न जातीय भेदभाव नहीं तो और क्या है?
इन कर्मियों को महीने के 8000–10000 रुपये वेतन पर काम करने के लिए बाध्य किया जाता है। आधुनिक यंत्रों के बजाय आज भी उन्हें नालों और सीवर में बिना मास्क, दस्ताने और सुरक्षा के उतारा जाता है। हर वर्ष सैकड़ों सफाई कर्मचारी दम घुटने, गैस रिसाव या संक्रमण से मौत के मुंह में चले जाते हैं। मगर न तो यह खबर बनती है, न आंदोलन।
जब देश चंद्रयान भेजने की दिशा में अग्रसर है, क्या यह उचित नहीं कि हम अपने शहरों की गंदगी साफ करने के लिए रिमोट कंट्रोल्ड मशीनों और सेनेटाइज्ड सिस्टम अपनाएं? क्या सफाई कर्मचारियों की जान इतनी सस्ती है कि उन्हें 21वीं सदी में भी मैनहोल में उतार दिया जाए?

सच्चाई यह है कि सफाई के पेशे में तकनीकी नवाचार इसलिए नहीं आया क्योंकि इससे जुड़े लोग सशक्तिकरण से दूर, सामाजिक बेड़ियों में जकड़े रहे। अगर सफाई का कार्य भी अन्य पेशों की तरह "पेशा" होता, न कि जातीय पहचान, तो कब का यंत्रीकरण हो गया होता। यह सोच समाज के जातीय भेदभाव की पराकाष्ठा है।
यह आत्मसम्मान का पुनर्जागरण काल खंड है, क्योंकि अब यह आवश्यक है कि सफाई कर्मचारी स्वयं इस व्यवस्था को तोड़ें। झाड़ू को छोड़ना प्रतीक है—उन बेड़ियों को छोड़ने का जो उन्हें गुलामी की ओर धकेलती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि सफाई का काम हेय है, बल्कि इसका भाव यह है कि सिर्फ एक जाति को इस पेशे में बांधकर रखना अत्याचार है।
सरकार को चाहिए कि वे सफाई कर्मचारियों के बच्चों के लिए शिक्षा, कौशल विकास, तकनीकी प्रशिक्षण, और वैकल्पिक रोजगार के लिए विशेष योजनाएं चलाएं। एससी- एसटी व ओबीसी आदि आयोग को भी इस दिशा में गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए कि यह जातीय पेशागत गुलामी अब भी किस रूप में जिंदा है।
हमारा सामाजिक दायित्व यह भी है कि हमें समाज के तौर पर यह स्वीकार करना होगा कि अगर एक पूरा समुदाय सिर्फ सफाई के पेशे तक सीमित है, तो यह हमारी सामूहिक विफलता है। हमें उन्हें हाशिए से मुख्यधारा में लाना होगा, उन्हें सिर्फ धन्यवाद नहीं, सम्मान, सुरक्षा और स्वावलंबन देना होगा।
 एक नई चेतना का आह्वान यह भी है कि अब समय आ गया है जब सफाई कर्मी अपने बच्चों को साफ-सुथरे स्कूलों में भेजें, उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और वैज्ञानिक बनते देखें—न की सफाई कर्मी।
"अब मत पकड़ो वो झाड़ू जो पीढ़ियों की बेड़ियाँ बन जाए,
अब मत उतरो उस गटर में जहां साँसें भी सिसक जाए।
उठो! अपनी जात नहीं, काबिलियत का परिचय दो,
अब संविधान के साहस से इतिहास को नया मोड़ दो।
मानव हो तुम—इंसान बनो, गुलामी की सीमा से पार चलो!"

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