योग दिवस नहीं, जीवन में लौटे योग
संपादकीय
22-06-2025
*योग दिवस नहीं, जीवन में लौटे योग*
योग दिवस पर जितना हो-हल्ला सरकारी दस्तावेजों, पोस्टरों और सोशल मीडिया पर देखने को मिला, उतनी ही चुप्पी असल ज़िन्दगी में योग को लेकर दिखाई देती है। योग, जो कभी भारतीय जनजीवन का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करता था, आज महज़ एक दिखावा बनकर रह गया है। कार्यक्रमों में माला पहनाकर, फोटो खिंचवाकर और दो-चार घण्टे की औपचारिकता निभाकर योग दिवस “मना” लिया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि योग वास्तव में कहाँ गया? यह केवल पार्कों और अखाड़ों तक सीमित क्यों रह गया है? क्या घरों में, खेतों में, रसोई में, दैनिक जीवन में योग के मूल स्वरूप को हम भूल चुके हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हमारी परंपरा में हर कार्य एक सहज योग था। किसान जब हल चलाता था, महिलाएं जब मथनी चलाती थीं, दूध निकालती थीं, चूल्हे पर रोटियां सेंकती थीं, सिलबट्टे पर चटनी पीसती थीं, कुओं से बाल्टी खींचकर पानी भरती थीं — ये सभी कार्य योग के जीवंत रूप थे। यह वो योग था जो शरीर को भी स्वस्थ रखता था और मन को भी स्थिर। लेकिन जैसे-जैसे जीवन में भौतिक संसाधनों की घुसपैठ बढ़ी, योग हमसे दूर होता गया और उसके स्थान पर रोगों ने घर कर लिया।
अब चूल्हे की जगह गैस है, मथनी की जगह मिक्सर है, कुएं की जगह मोटर है, और श्रम की जगह आराम ने ले ली है। इसी के साथ शारीरिक रोगों का प्रवेश हुआ — थायरॉइड, पीसीओडी, मोटापा, अवसाद, रक्तचाप, अनिद्रा, मानसिक तनाव और रिश्तों की दरारें। महिलाएं जो कभी पूरे घर की धुरी थीं, अब शारीरिक निष्क्रियता की शिकार होकर डॉक्टरों की कतारों में खड़ी हैं। पुरुष जिनके लिए खेत-खलिहान श्रमसाध्य जीवन का हिस्सा था, अब टीवी और मोबाइल की दुनिया में जकड़े हुए हैं। बच्चों के खेल अब स्क्रीन तक सीमित हो गए हैं और उनके भीतर जन्मजात रोगों ने प्रवेश करना शुरू कर दिया है।
सोशल मीडिया पर योग के नाम पर फोटो खिंचवाने वाले यह भूल जाते हैं कि योग कोई ‘फिल्टर इमेज’ नहीं, वह एक जीवन पद्धति है। जब तक योग जीवन में नहीं उतरेगा, तब तक योग दिवस एक दिखावा ही रहेगा। हमारे घरों में जितना सहज योग था, उतना आज के आधुनिक पार्कों में नहीं मिलेगा। आंगन में गोबर से लिपाई, हाथ की चक्की, मथनी, हाथ से पानी भरना, मिट्टी के घरों की देखभाल – ये सब अनायास योग थे। लेकिन अब जीवन इतनी भौतिकता में लिपटा है कि महिलाएं बीमार, पुरुष चिड़चिड़े, बच्चे उलझे हुए और बुजुर्ग उपेक्षित हो गए हैं। यह सब योग के लोप का ही परिणाम है।
दुखद यह है कि योग दिवस एक कार्यक्रम बनकर रह गया है। न तो प्रशासनिक स्तर पर ईमानदार पहल हो रही है, न समाज के स्तर पर। यह एक गंभीर चिंतन का विषय है कि हम साल में एक दिन योग का प्रदर्शन करें, और बाकी 364 दिन रोगों का निवारण ढूंढते फिरें। हमें फिर से अपने घर-गांव की उस जीवनशैली को अपनाना होगा जिसमें शरीर खुद-ब-खुद कसरत करता था, मन शांति में रहता था, और परिवार में संवाद होता था। हमें फिर से उस राह पर लौटना होगा जहां खेती, पशुपालन, रसोई और घर-आंगन योग के माध्यम बनते थे। जब तक योग फिर से हमारी सांसों में नहीं लौटेगा, तब तक योग दिवस सिर्फ़ सरकारी कैलेंडर का एक दिन बना रहेगा, और हमारी जीवनशैली रोगों की स्थायी ग्राहक बनी रहेगी।
इस चेतना को जगाने की आज सबसे अधिक आवश्यकता है क्योंकि आज समाज सोशल मीडिया के आभासी रिश्तों में उलझ चुका है, मानसिक अवसाद चरम पर है और युवा पीढ़ी भावनात्मक रूप से टूटती जा रही है। रिश्तों में विश्वास समाप्त होता जा रहा है, विवाह जैसे पवित्र बंधन तक टूटते जा रहे हैं। यह सब इस बात का संकेत है कि हमने जीवन से योग को बाहर कर दिया है, और उसकी जगह बीमारी, अवसाद, तनाव और अस्थिरता ने ले ली है। अब भी समय है, चेतो, लौटो उस योग की ओर जो हमारे घरों में था, खेतों में था, रसोई में था, जीवन में था। वरना आने वाले समय में न केवल हम शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार हो जाएंगे, बल्कि हमारी अगली पीढ़ियां भी भटक जाएंगी।
"न योग रहा ना घर में शांति, मशीनों ने छीना सारा संजीव,
लौटो प्रकृति की गोद में साथी, यही है सच्चा योग-दिवस जीव।"
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