लोकतंत्र की आँच पर सुलगते सवाल – क्या भारत अपने मूल्यों से भटक रहा है?
संपादकीय
27 जून 2025
*"लोकतंत्र की आँच पर सुलगते सवाल – क्या भारत अपने मूल्यों से भटक रहा है?"*
भारतवर्ष आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर विश्व पटल पर देश की छवि एक उभरती आर्थिक शक्ति, तकनीकी महाशक्ति और वैश्विक नेतृत्वकर्ता की बनी हुई है; तो वहीं दूसरी ओर भीतर से यह राष्ट्र लोकतंत्र की नींव, सामाजिक न्याय, समरसता, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर गहरी बेचैनी में जकड़ा हुआ प्रतीत होता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगी कि बोलता है।
आज जब आमजन रोटी, रोजगार, शिक्षा और चिकित्सा जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष कर रहा है, तब सत्तासीन ताकतें इन मुद्दों से ध्यान भटकाकर धार्मिक ध्रुवीकरण, दिखावटी राष्ट्रवाद और मीडिया के भ्रम जाल में देश को उलझा रही हैं। लोकतंत्र की आत्मा "जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता की सरकार" अब बहुराष्ट्रीय पूंजी, कॉरपोरेट हित और सत्ता की सुविधा के लिए गढ़ी जा रही भाषा बनती जा रही है।
भारत का संविधान – जो बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की बुद्धिमत्ता और सामाजिक चेतना की विरासत है – आज महज एक संदर्भ पुस्तिका बनकर रह गया है।
जातिगत भेदभाव, महिला असुरक्षा, पत्रकारों पर हमले, विश्वविद्यालयों में छात्र विरोधों का दमन, असहमति की आवाजों को देशद्रोह बताकर कुचलना, ये वो संकेत हैं जो किसी भी सभ्य लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
अफ़सोस इस बात का है कि डिजिटल इंडिया और स्मार्ट इंडिया की चकाचौंध में सामाजिक न्याय और समानता की मांग करने वालों को या तो “विकास विरोधी” कह दिया जाता है या “राष्ट्रविरोधी” ठहरा दिया जाता है। क्या यही लोकतंत्र है जहाँ सवाल पूछने की आज़ादी को कुचल दिया जाए?
युवा, जो भारत की असली ताकत हैं, आज या तो बेरोजगारी के दलदल में फंसे हैं या सामाजिक माध्यमों पर उग्र विचारधाराओं की बिसात पर मोहरे बन गए हैं। शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि एक बेरोजगार डिग्रीधारी तैयार करना बनता जा रहा है।
सवाल यह नहीं कि कौन सत्ता में है, सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र की मूल आत्मा – सम्यक न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता – जीवित रह पा रही है? क्या हम गांधी, अंबेडकर, भगतसिंह और सुभाष के सपनों के भारत की ओर बढ़ रहे हैं, या किसी अंधेरी गली में दिशाहीन हो चुके हैं?
आज ज़रूरत है आत्मचिंतन की।
सत्ता से नहीं, समाज से सवाल करने की। हमें एक ऐसे भारत की कल्पना करनी होगी जो आर्थिक, सामाजिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र हो। जहाँ हर नागरिक को अपनी बात कहने का हक़ हो, जहाँ संविधान केवल किताबों में नहीं, ज़िन्दगी में महसूस किया जा सके।
यह चिंतन केवल एक चेतावनी नहीं, एक आह्वान है –
आइए! फिर से उस भारत को गढ़ें जो संवैधानिक मूल्यों की नींव पर खड़ा हो।
जहाँ न कोई छोटा हो, न कोई बड़ा –
सब हों, सिर्फ़ “भारतीय”।
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