संस्कार बनाम प्रदर्शन – मृत्यु परंपराओं में बदलाव की पुकार”
संपादकीय
26 जून 2025
“संस्कार बनाम प्रदर्शन – मृत्यु परंपराओं में बदलाव की पुकार”
मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है। समाज में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया न केवल भावनात्मक होती है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक चेतना, परंपराओं और सामाजिक व्यवहार का भी प्रतिबिंब होती है। किंतु इन परंपराओं में समय, परिस्थिति और समाज के अनुसार बदलाव भी अपरिहार्य है।
आज जब हम अंतिम संस्कारों के बदलते स्वरूप पर नज़र डालते हैं, तो एक ऐसा पहलू सामने आता है जिस पर गंभीरता से विचार की आवश्यकता है। पहले जहां अर्थी पर वस्त्र, साड़ी, लूगड़ी जैसे पारंपरिक वस्त्र मृतक को श्रद्धांजलि स्वरूप अर्पित किए जाते थे, वहीं सामाजिक सुधारकों ने इसका विकल्प नारियल जैसे प्रतीकात्मक और उपयोगी भेंट देने का सुझाव दिया। इसका उद्देश्य पर्यावरणीय दृष्टि से सराहनीय था, ताकि वस्त्रों का अपव्यय और प्रदूषण रोका जा सके।
लेकिन अब यह नया विकल्प भी अपने मूल उद्देश्य से भटक चुका है। आज 50 से 100 तक नारियल मृतक की देह पर अर्पित किए जा रहे हैं। एक नारियल की कीमत ₹30 से ₹35 तक है, यानी अंतिम संस्कार में ही ₹1500 से ₹3500 की पौष्टिक खाद्य सामग्री आग में स्वाहा की जा रही है। क्या यह व्यवहारिक और विवेकपूर्ण परंपरा है? क्या एक भूखे समाज में, जहां कुपोषण एक बड़ी समस्या है, हम पौष्टिक नारियल को यूं ही जला देने का तर्कसंगत औचित्य खोज सकते हैं?
हमें समझना होगा कि श्रद्धांजलि प्रदर्शन का माध्यम नहीं होनी चाहिए। श्रद्धा का अर्थ दिखावे से नहीं, संवेदनशीलता और व्यावहारिकता से होता है। आज की आवश्यकता यह है कि अंतिम संस्कार के अवसरों पर कपड़ों या नारियलों के स्थान पर ऐसी वस्तुएं दी जाएं, जिनका उपयोग मृतक के परिजनों को सहारा देने में हो।
यदि श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ देना है, तो हवन सामग्री दी जा सकती है, जो अंतिम संस्कार में उपयोगी हो और आर्थिक बोझ भी न डाले।
नगद राशि भेंट करना एक सार्थक विकल्प है, जिससे मृतक के परिवार की आर्थिक सहायता की जा सकती है या अंतिम संस्कार की लकड़ी आदि की व्यवस्था में सहयोग किया जा सकता है।
मृतक की स्मृति में दी गई राशि का जनहितकारी कार्यों (जैसे सार्वजनिक स्थान पर पौधारोपण, पुस्तकालय में पुस्तक दान, विद्यालय में जरूरतमंद छात्रों के लिए सहयोग) में उपयोग करना, समाज के लिए प्रेरणास्पद उदाहरण बन सकता है।
हमें स्वीकार करना होगा कि परंपराएं समय के साथ परिवर्तित होती हैं। सामाजिक सुधार कोई रूढ़िवादी परंपराओं को अपमानित करने का कार्य नहीं है, बल्कि इन्हें सार्थक, उपयोगी और यथार्थवादी बनाना ही सही दिशा में उठाया गया कदम है।
आज समाज को आवश्यकता है संवेदनशील नेतृत्व और विवेकशील नागरिकों की, जो भावनाओं का सम्मान करते हुए व्यर्थ के प्रदर्शन पर नियंत्रण कर सकें। श्रद्धांजलि का माप यह नहीं होना चाहिए कि कितने नारियल जलाए, कितने कपड़े दिए — बल्कि यह होना चाहिए कि हमने मृतक की आत्मा की शांति के लिए कितना सार्थक और सकारात्मक कार्य किया।
अब समय आ गया है कि मृत्यु संस्कारों में भी सुधार की ज्योति जलाई जाए। पौष्टिक वस्तुओं की अग्नि में आहुति नहीं, बल्कि समाज में उपयोग हो — यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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