शराब के प्याले में डूबी शिक्षा की नाव

संपादकीय 
24/06/2025
 *शराब के प्याले में डूबी शिक्षा की नाव* 

राजस्थान राज्य सरकार के फैसलों की दिशा को देखकर यह समझ में आ गया है कि आने वाला भविष्य किस नाव में सवार होकर डूबेगा—शिक्षा के जहाज में छेद किए जा रहे हैं और शराब के जहाज को पतवार दी जा रही है। राजस्थान की रेत पर जब-जब विकास की इबारत लिखी गई, तब-तब उम्मीद जगी कि अब इस प्रदेश के बच्चों के हाथ में किताब होगी, कलम होगी, उज्ज्वल भविष्य होगा। लेकिन हालिया सरकारी फैसलों ने उस उम्मीद पर बोतल का ढक्कन कस दिया है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
 एक तरफ राज्य में 67 नई शराब की दुकानें खोलने की घोषणा हुई है, जिससे कुल ठेकों की संख्या 741 हो जाएगी, वहीं दूसरी तरफ 4000 सरकारी स्कूल बंद करने और 35,000 शिक्षकों के पद खत्म करने का फरमान जारी किया जा रहा है। यह नीतिगत फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक आत्महत्या का सरकारी दस्तावेज है, जिसमें लिखा है कि अब  शिक्षा की नहीं, शराब की जरूरत है। सरकार शायद यह मान बैठी है कि जब नौकरी नहीं है, रोजगार नहीं है, तब आदमी को रोजगार की चिंता से राहत देने का सबसे सस्ता और आसान तरीका यही है कि उसे शराब थमा दो, ताकि वह भूख भूल जाए, बेरोजगारी भूल जाए, और भूल जाए कि उसके बच्चों का स्कूल अब बंद हो चुका है। राजस्थान जैसे राज्य में, जहां पहले से ही सुदूर गांवों और रेगिस्तानी इलाकों में शिक्षा पहुंचाना एक चुनौती रहा है, वहां हजारों स्कूलों को बंद करना एक ऐसा कदम है जो आने वाली पीढ़ियों को अंधकार में धकेलने जैसा है। और फिर इसी अंधकार में सरकार उन्हें शराब की दुकान के उजाले में खड़ा देखना चाहती है। जब शिक्षक नहीं होंगे, स्कूल नहीं होंगे, तो बच्चा शिक्षा कहां से पाएगा? क्या बार को अब बाल पाठशाला घोषित किया जाएगा? क्या प्रधानाचार्य की जगह ठेका मैनेजर नियुक्त होगा। यहां सवाल तो बनता है।यह सवाल तो पूछा जाना चाहिए क्योंकि यह आंकड़े महज नीतिगत फैसले नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर लगाया गया सरकारी तमाचा है, जो यह घोषित करता है कि अब ज्ञान नहीं, नशा बिकेगा। सोचिए, जब गांव में स्कूल नहीं होगा तो बच्चा शिक्षा कहां से पाएगा? और जब शिक्षक ही नहीं होंगे तो ज्ञान किससे लेगा? क्या सरकार यह मानकर चल रही है कि शराब के ठेके नई पाठशालाएं बनेंगे और वहां बोतलों के बीच भविष्य की योजनाएं तैयार होंगी? अब यह समझना मुश्किल नहीं रहा कि सरकार ने शायद “पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया” का नारा बदल कर “पिएगा इंडिया तभी तो लुटेगा इंडिया” बना लिया है। स्कूलों को मर्ज करने की योजना को शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का बहाना बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि स्कूल मर्ज होंगे तो दूरी बढ़ेगी, दूरी बढ़ेगी तो ड्रॉपआउट भी बढ़ेंगे, और शिक्षा सिर्फ आंकड़ों की रिपोर्ट में ही बची रह जाएगी। शिक्षक, ,जो समाज की रीढ़ होते हैं, उनके पद समाप्त करना किसी राष्ट्र की नींव खोदने जैसा है। वहीं शराब की दुकानों का विस्तार करना उस खोदी गई नींव पर नशे की इमारत खड़ी करने जैसा है। सरकार से कोई पूछे कि क्या यही है नया भारत, जहां स्कूलों को बंद करके बच्चों को ठेके की तरफ मोड़ा जा रहा है? क्या यही ‘विकास’ है, जहां शिक्षा के साधन छीने जा रहे हैं और नशे के साधन मुफ्त में उपलब्ध कराए जा रहे हैं? अब शायद शिक्षा विभाग को आबकारी विभाग में मर्ज कर देना चाहिए और शिक्षकों को ठेका प्रबंधक बना देना चाहिए, ताकि “ज्ञान से ज्ञानेश्वर” की जगह “बोतल से भवानीपुर” तैयार किया जा सके। यह महज नीति नहीं, एक सोच है, एक दिशा है जो समाज को शिक्षा से दूर और शराब के करीब ले जा रही है। अब ये जनता को तय करना है कि अगली पीढ़ी के हाथ में किताब होगी या गिलास। ये सिर्फ दो खबरें नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा आईना हैं जिसमें पूरे तंत्र की मानसिकता साफ दिखाई देती है। सवाल सिर्फ इतना है कि जब स्कूल बंद हो रहे हों और ठेके खुल रहे हों, तब क्या हम सचमुच प्रगति कर रहे हैं या पतन की ओर कदम बढ़ा रहे हैं?
क्या अब विद्यालय की प्रार्थना सभा अब “खुल जा सिम-सिम” की जगह “खुल जा बीयर कैन” से शुरू होगी? ऐसे में यह कहना गलत न होगा कि सरकार अब शिक्षा नहीं, शराब में निवेश कर रही है। प्रदेश में शिक्षा की रीढ़ मानी जाने वाली सरकारी स्कूल प्रणाली को तोड़ा जा रहा है और इसके स्थान पर बोतलों की नई श्रृंखला खड़ी की जा रही है। यह वही राजस्थान है जहां बच्चों ने धोरों में बैठकर पढ़ाई की, जहां शिक्षकों ने न्यूनतम संसाधनों में भी ज्ञान की लौ जलाए रखी, और आज उसी राज्य में शिक्षा को बंद कर, शराब को विस्तार देने की योजना बनाई जा रही है। अब शायद समय आ गया है जब राज्य सरकार को 'शिक्षा संकल्प यात्रा' की जगह 'शराब स्वागत यात्रा' निकालनी चाहिए और नारा देना चाहिए — "हर गाँव में ठेका, हर बच्चे के हाथ में कैन!"। यह समय सिर्फ सवाल पूछने का नहीं, बल्कि चेतने का है। वरना आने वाला इतिहास राजस्थान को यह कहकर याद करेगा — “जिस प्रदेश ने रेत से हरियाली उगाई, उसी ने नशे से पीढ़ी सुखाई।”

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