इलाज के नाम पर व्यापार: क्या इंसान अब सिर्फ मुनाफे का शरीर बन गया है?
✍️ संपादकीय
29 जून 2025
*“इलाज के नाम पर व्यापार: क्या इंसान अब सिर्फ मुनाफे का शरीर बन गया है?”*
आज का दौर ऐसा हो चला है जहाँ इलाज अब सेवा नहीं, एक ‘सिस्टमेटिक बिजनेस मॉडल’ बन गया है। डॉक्टर अब देवता नहीं, कॉरपोरेट अस्पतालों के वे कर्मचारी बनते जा रहे हैं जिनके सामने मरीज सिर्फ एक “केस” होता है — एक मुनाफे का स्रोत है। मरीज जितना बड़ा, बीमारी जितनी गंभीर, और केस जितना लंबा—उतना ही अस्पताल का बिल बड़ा। यह कोई भावुक आरोप नहीं, यह हमारे आसपास रोज़ घट रही सच्चाई है।
फ्री इलाज: नाम में राहत नहीं, बल्कि हकीकत में फरेब है।सरकारें गरीबों और बुजुर्गों के लिए “फ्री इलाज” की योजना बनाती हैं। सुनने में बड़ा अच्छा लगता है, लेकिन जब जमीन पर इसे देखा जाए तो सच्चाई बिल्कुल अलग मिलती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर करोगे कि बोलता है।
बुजुर्गों को अस्पतालों में जबरन भर्ती किया जाता है, कई बार ऐसी स्थिति में जब घर पर देखभाल से भी उनका जीवन अधिक शांत और गरिमामय हो सकता था। लेकिन क्योंकि इलाज “फ्री” है, इसलिए अस्पतालों को मरीज़ चाहिए।
और फिर शुरू होता है असली खेल—जांच पर जांच, दवा पर दवा, ICU में दिन गिनवाने वाला हिसाब, और बुजुर्ग शरीर को एक प्रयोगशाला बना देना। क्या यह इलाज है? या फिर “पैकेज क्लेम” बढ़ाने की अंधी दौड़? और डॉक्टर का स्टेथोस्कोप नहीं, अस्पताल का टारगेट बोलता है। आज कई अस्पतालों में डॉक्टरों को “टारगेट” दिए जाते हैं—इतने मरीज भर्ती करो, इतने टेस्ट करवाओ, इतने पैकेज पूरे करो। यह कोई गुप्त बात नहीं है। कई डॉक्टरों ने खुद स्वीकार किया है कि अस्पताल प्रशासन उनसे “परफॉर्मेंस” की अपेक्षा रखता है।
ऐसे में वह डॉक्टर, जिसने कभी सेवा की शपथ ली थी, अब खुद व्यापार का हिस्सा बन चुका होता है।
मरीज के लिए जरूरी न हो तो भी ICU में रखा जाता है, ऑक्सीजन लगाया जाता है, दिनभर मशीनों से घिरा कर रखा जाता है ताकि इलाज "जारी" रहे। एक-एक जांच हजारों की होती है। और फिर कहा जाता है—“इलाज तो फ्री है, चिंता मत कीजिए”। पर ये इलाज नहीं, मुनाफे का मैकेनिकल ऑपरेशन है।बुजुर्गों के साथ सबसे बड़ा अन्याय है।
सबसे अधिक शिकार होते हैं हमारे बुजुर्ग। वे न लड़ सकते हैं, न सवाल कर सकते हैं। डॉक्टर जो कहता है, परिवार वही मानता है। और डॉक्टर वही करता है जो अस्पताल कहता है। 80 वर्षीय शरीर जिसमें अब आराम की ज़रूरत होती है, उसे ICU में जकड़ दिया जाता है, जहाँ न कोई अपना दिखता है, न कोई अपनापन होता है।
उनके हाथों में सुइयाँ, आंखों में डर, और पास बैठने वाला कोई नहीं। क्या यही है इलाज?
कई बार तो ऐसा लगता है कि बुजुर्गों के शरीर पर "पैकेज पूरा" करने के लिए दवाइयों का परीक्षण हो रहा है।
क्या विकल्प नहीं हैं? हैं, लेकिन भावना चाहिए। अगर परिवार सच में अपने बुजुर्ग से प्रेम करता है, तो उसे यह समझना होगा कि इलाज का मतलब हर हाल में अस्पताल नहीं होता। आज घर पर इलाज की सुविधा उपलब्ध है—नर्स, दवाएं, मशीनें। पर जो सबसे ज़रूरी है, वो है अपनापन।
अगर बुजुर्ग अपने अंतिम समय में घर पर अपनों के बीच हों, मनचाहा खा सकें, अपने लोगों को देख सकें, तो यही असली “इलाज” है। जो आत्मा को शांति दे, वही इलाज है।
फ्री का इलाज अब स्वास्थ्य नहीं, सौदा बन चुका है। आज की मेडिकल व्यवस्था का असली चेहरा यह है कि यह अब स्वास्थ्य सेवा नहीं, स्वास्थ्य व्यापार है। मरीज को ठीक करना अब उद्देश्य नहीं है, मुनाफा कमाना प्राथमिकता है। फ्री इलाज की आड़ में अस्पताल करोड़ों का बिल बनाते हैं, सरकारें आंकड़ों का ढोल पीटती हैं, और मरीज—वह तो मशीनों में उलझकर चुपचाप दम तोड़ देता है।
अगर यह सिस्टम नहीं बदला, तो अगली पीढ़ी की सोच यही होगी—“बीमार मत हो, वरना पैकेज में फंस जाओगे।”
अब समय आ गया है कि देश गंभीरता से इस सवाल पर चिंतन करे—क्या इलाज अब मानवता के लिए है, या सिर्फ अस्पतालों के मुनाफे के लिए?
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