जो बचता नहीं, उसी में उलझे हैं

✍🏻 संपादकीय 
28jun2025
 *"जो बचता नहीं, उसी में उलझे हैं"* 

 जीवन का गणित  सीखने के लिए असली ट्रिक जो  हम भूल रहे हैं, जो लेकर जाना है, उसे छोड़ रहे हैं; और जो यहीं रह जाना है, उसे जोड़ रहे हैं। यह जीवन एक गूढ़ गणित है, जिसे सुलझाने के लिए अंकों से ज्यादा आत्मबोध और अनुभव की आवश्यकता होती है। इंसान का स्वभाव बड़ा ही विचित्र है। वह उन वस्तुओं, संबंधों और आकांक्षाओं के पीछे भागता है जिन्हें एक दिन यहीं छोड़कर जाना है, और उन मूल्यों, संवेदनाओं और विचारों को नज़रअंदाज़ कर देता है जो सदा साथ चलते हैं—जिनसे जीवन का वास्तविक अर्थ बनता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज की तेज़ भागती दुनिया में मनुष्य अपनी "मूल जीवन गणना" से भटकता जा रहा है। समाज में दिखावा, भौतिकता और पद की होड़ इतनी तीव्र हो चुकी है कि लोग यह भूलते जा रहे हैं कि सच्ची खुशी कैसे जोड़ी जाती है, और मानसिक शांति कैसे घटाई जाती है। हम यह तो जानते हैं कि धन कैसे कमाया जाए, लेकिन यह नहीं सीख पाए कि दुःख को कैसे कम किया जाए या संबंधों में अपनत्व कैसे बढ़ाया जाए।

गणित की एक सीधी-सी सिखावन है—हर समस्या का हल होता है। यही सूत्र जीवन पर भी लागू होता है। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने भीतर झांकें, अपने कर्मों की दिशा को समझें और अपने सोच के समीकरण को संतुलित करें। जीवन में समस्याएं होंगी, अवरोध आएंगे, लोग साथ छोड़ेंगे, परंतु यदि विश्वास बना रहे और कर्म सच्चे हों, तो समाधान अवश्य मिलेगा।

जब हम बचपन में होते हैं, तो चीज़ों को पाने की ज़िद होती है। समय के साथ जैसे-जैसे हम परिपक्व होते हैं, यह ज़िद "सब्र" में बदलती है। यही परिवर्तन दर्शाता है कि अब हमने जीवन की असली शिक्षा को समझना शुरू कर दिया है। जब ज़िद सब्र पर उतर आए, तो समझो अब इंसान बड़ा हो गया है।

यह भी एक गहरी बात है कि इंसान धोखा दे सकता है, लेकिन नसीब नहीं। भाग्य या नसीब कोई चमत्कारी शक्ति नहीं, बल्कि हमारे ही कर्मों और सोच की परिणति है। यदि मन और मस्तिष्क शांत हो, कर्म निष्कलंक हों, और दृष्टिकोण सकारात्मक हो, तो समय चाहे जैसा भी हो, नसीब धोखा नहीं देगा।

आज जब समाज तनाव, भ्रम, अविश्वास और अव्यवस्था से घिरा है, तब यह विचार अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि व्यक्ति प्रसन्नचित्त और तनावमुक्त रहते हुए अपने कर्मपथ पर डटा रहे। ऐसा करने से न केवल व्यक्तिगत संतुलन बना रहता है, बल्कि समाज भी सकारात्मकता की दिशा में आगे बढ़ता है।

जीवन के गणित में कुछ जोड़ने के लिए बहुत कुछ घटाना पड़ता है। कुछ पाना हो तो त्याग करना पड़ता है। और जो व्यक्ति इस समीकरण को समझ गया, वही वास्तव में जीवन का गणितज्ञ है—जो हर उलझन का समाधान ढूंढ़ सकता है।

समस्या नहीं, समाधान सोचिए। मोह नहीं, मूल्य जोड़िए। रिश्ते नहीं, अपनापन बचाइए। दिखावा नहीं, सादगी अपनाइए। यही जीवन का असली अंकगणित है—जिससे कोई परीक्षा कठिन नहीं लगती।
आप आज किसे जोड़ रहे हैं—वो जो यहीं रह जाना है?
या वो जो साथ चलकर आपको खुद से जोड़ता है?

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