हवाई सुरक्षा की दरकती परतें

संपादकीय 
18 जून 2025
हवा में लहराता भरोसा या टूटता नियमन?
 *हवाई सुरक्षा की दरकती परतें* 

हर उड़ान के साथ एक सपना भी ऊंचाई पर पहुंचता है—गंतव्य तक सुरक्षित पहुंचने का, अपने प्रियजनों से मिलने का, जीवन को गति देने का। पर जब वही उड़ान मौत का परवाना बन जाए, तो सवाल उठते हैं—केवल तक़दीर पर नहीं, हमारी व्यवस्था, तकनीकी निगरानी और नियामक ईमानदारी पर भी। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

हाल की घटनाओं ने हमें झकझोर कर रख दिया है। एयर इंडिया के ड्रीमलाइनर विमान का क्रैश और उत्तराखंड के गौरीकुंड में हेलीकॉप्टर हादसे में पायलट समेत 7 लोगों की दर्दनाक मौत, उस व्यवस्थागत विफलता की ओर इशारा करती हैं जिसे बार-बार 'दुर्घटना' कहकर टाल दिया जाता है। केदारनाथ यात्रा के 38 दिनों में 4 हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं और 13 मौतें—क्या यही है "आस्था की उड़ान"?

हवाई यात्रा को अब तक 'सबसे सुरक्षित यात्रा साधन' माना जाता था, लेकिन भारतीय संदर्भ में यह धारणा अब गंभीर पुनर्विचार की मांग कर रही है। डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) की जिम्मेदारी केवल लाइसेंस बांटना नहीं, बल्कि तकनीकी निगरानी को कड़ाई से लागू करना भी है। प्रश्न यह है कि बोइंग के विमानों की "अतिरिक्त जांच" दुर्घटना के बाद ही क्यों की जाती है? क्या मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) एक हादसे की प्रतीक्षा करती है?

भारत आज विमानन सुरक्षा में वैश्विक रैंकिंग में 48 वें स्थान पर है। देश की कोई भी प्रमुख एयरलाइन शीर्ष 25 में नहीं है। फिर भी 198 से अधिक विमानों के साथ एयर इंडिया जैसे फ्लैगशिप कैरियर का संचालन जारी है, जिनमें तकनीकी लापरवाही की शिकायतें अक्सर सामने आती रही हैं। बोइंग 787 ड्रीमलाइनर जैसी विमान श्रृंखला पर जापान ने जहां सख्ती से रोक लगाई, भारत में अब तक ऐसी हिम्मत नहीं दिखाई गई। क्या कारण है कि नियामक एजेंसियां अपनी भूमिका केवल 'जांच कमेटियां गठित करने' तक सीमित रखती हैं?
उत्तराखंड के हेलीकॉप्टर हादसे हमारे लिए विशेष रूप से चिंताजनक हैं। तीर्थयात्रा जैसी आस्था आधारित सेवाओं में भी 'मुनाफे की हवस' ने सुरक्षा की हर परत को छेद डाला है। एक घंटे में 3–4 फेरों की सीमित अनुमति के बावजूद, 9 कंपनियां दिनभर में 140 से अधिक उड़ानें भर रही थीं। इनमें से कई उड़ानें नियम विरुद्ध समय और भार के साथ भरी गईं—जो स्पष्टतः 'उड़ते हुए जुर्म' हैं।

इस पूरे तंत्र में जब सत्ता, भ्रष्टाचार और लापरवाही त्रिकोण बना लें, तो हादसे केवल 'संयोग' नहीं रह जाते। वे योजनाबद्ध त्रासदियां बन जाती हैं, जिनका शिकार वे लोग बनते हैं जो भरोसे और भक्ति के साथ एक टिकट लेते हैं।

अब सवाल यह नहीं कि अगली दुर्घटना कब होगी, बल्कि यह है कि क्या हम इससे पहले चेतेंगे?
सरकार को चाहिए कि वह अब केवल रिपोर्ट लिखने वाली समितियां न बनाए, बल्कि स्वतंत्र, तकनीकी रूप से दक्ष और जवाबदेह हवाई सुरक्षा आयोग का गठन करे। सभी निजी व सरकारी एयरलाइनों और हेली कंपनियों के लिए एक सख्त ऑडिट प्रणाली लागू की जाए। हादसों में दोषी पाए गए ऑपरेटरों को काली सूची में डाला जाए और उनके लाइसेंस तुरंत प्रभाव से निरस्त किए जाएं।
भरोसे की उड़ान को फिर से आसमान देना है, तो नियमन की ज़मीन को अब सख्त और ईमानदार बनाना होगा। यह वक्त अफसोस का नहीं, आक्रोश को जवाबदेही में बदलने का है। अंत में यही कहा जा सकता है-

 "जो उड़ानें थीं कभी सपना,
अब बन गईं हैं मातम का पल।
अगर न चेते अब भी हम,
तो आसमां भी करेगा ग़ज़ल—
‘जो ज़मीन पर ना रहे वफ़ा,
वो आसमां में क्या देगा क़सम!’”

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