जीवन की दृष्टि: सुख और दुःख का संतुलन
संपादकीय:
13 फरवरी 2025
"जीवन की दृष्टि: सुख और दुःख का संतुलन"
जीवन एक अनंत यात्रा है, जिसमें हमें सुख और दुःख दोनों का सामना करना पड़ता है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जीवन को जीने का सही तरीका क्या है? क्या हमें सुखों को निहारना चाहिए या दुःखों को देखना चाहिए? यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जीवन को, जीवन की दृष्टि से जीने का अनुभव ही जीवन में अतंर्दृष्टि को खोलने का आधार है। अगर हम दुःखों को देखने जाएंगे, तो धरती पर ऐसा कौन-सा प्राणी है जिसे अपने जीवन में दुःखों और कष्टों का सामना नहीं करना पड़ा हो। अगर सुखों को निहारते जाएं, तो ऐसा कौन-सा स्थान और घटक है, जहां हम सुखी होकर सुख देखने जाएं और हमें सुख ना दिखाई दे।
वहीं सुख की चाहत में आप कांटों को निहारोगे तो जीवन में कष्ट ही कष्ट दिखाई देंगे और कांटों के ऊपर खिलने वाले गुलाबों पर ध्यान देंगे तो जीवन में खिलावट ही खिलावट नजर आएगी।
हमारा जीवन तो हमारे लिए किसी तानपुरे की तरह होता है, जिसके तारों को अगर कसना और साधना आ जाए तो तानपुरे के तार संगीत का सुकून देने लग जाते हैं और अगर तारों को कसना और साधना न आए तो तानपुरे के तार ही कौए की काँव-काँव तरह बन जाया करते हैं ।
वास्तव में अगर हम दुःखों को देखने जाएंगे, तो धरती पर ऐसा कौन-सा प्राणी है जिसे अपने जीवन में दुःखों और कष्टों का सामना ना करना पड़ा हो। लेकिन अगर सुखों को निहारते जाएं, तो ऐसा कौन-सा स्थान और घटक है, जहां हम सुखी होकर सुख देखने जाएं और हमें सुख ना दिखाई दे।
यहां एक महत्वपूर्ण बात है कि सुख और दुःख दोनों ही जीवन का हिस्सा हैं। हमें सुखों को निहारना चाहिए, लेकिन दुःखों को भी स्वीकार करना चाहिए।
इसलिए, हमें अपने जीवन को सुख और दुःख के संतुलन में जीना चाहिए। हमें सुखों को निहारना चाहिए, लेकिन दुःखों को भी स्वीकार करना चाहिए। हमें अपने जीवन को एक तानपुरे की तरह कसना और साधना चाहिए, ताकि हमारे जीवन में संगीत का सुकून देने वाले तार बज सकें।
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