जीवन की सच्चाई: सुख, दुःख और मौन

संपादकीय: 
9 फरवरी 2025
"जीवन की सच्चाई: सुख, दुःख और मौन"

एक चुपी सौ को हरा दे। अर्थात क्रोध के समय मौन भाषा अनेको लोगों को हरा सकती है। सच्चाई को छुपा कर मौन धारण करना भी गुनाह है। 
जीवन में सुख और दुःख दोनों ही अविभाज्य हैं। हर व्यक्ति सुख पाने की लालसा रखता है, लेकिन अक्सर अपने सुख के लिए दूसरों को दुखी कर स्वयं को नष्ट करने जैसी स्थिति पैदा कर लेता है। यही कारण है कि जीवन में सुख और दुःख के बीच संतुलन बनाना बहुत जरूरी है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

कहते हैं कि अज्ञान की शक्ति क्रोध है और ज्ञान की शक्ति मौन है। यह सच है कि मौन रहने से हम अपने जीवन को शांत और सुखी बना सकते हैं। लेकिन यह भी सच है कि मौन रहने का मतलब यह नहीं है कि हम सच का पता होने पर भी चुप रहें।

जीवन में नसीहत देना और सीखना दोनों ही जरूरी हैं। लेकिन नसीहत देते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम दूसरों को शर्मिंदा न करें। हमें उद्देश्य को ध्यान में रखकर नसीहत देनी चाहिए, न कि दूसरों को नीचा दिखाने के लिए।

जीवन में सुख और दुःख के बीच संतुलन बनाने के लिए हमें मौन रहने की शक्ति को अपनाना चाहिए। हमें नसीहत देनी चाहिए, लेकिन दूसरों को शर्मिंदा नहीं करना चाहिए। और सबसे महत्वपूर्ण बात, हमें जीवन में सुख और दुःख के बीच संतुलन बनाने के लिए अपने जीवन को शांत और सुखी बनाने का प्रयास करना चाहिए।

मन को वश में करना बड़ा कठिन होता है। हर व्यक्ति सुख पाने की लालसा रखता है परंतु अपने सुख के लिए दूसरों को दुखी कर स्वयं को नष्ट करने जैसी स्थिति पैदा भी करता है क्योंकि हम अपने सुख के लिए किसी भी पाप को करने के लिये तैयार हो जाते हैं। सुख का आनंद और दुःख का समाधान ही जीवन है। जो आनंद शांत रहकर चुप रहने में है, वो शिकायत करने में नहीं… क्योंकि… अज्ञान की शक्ति क्रोध है और ज्ञान की शक्ति मौन है।
कहते हैं कि गूंगा वो नहीं होता जो बोल नहीं पाता है बल्कि गूंगा वो होता है जो सच का पता होने पर भी चुप रहता है! वैसे आप कुछ भी कर लो जिसे कमियां ढूंढने की आदत होती है, उसे आप कभी खुश नहीं कर सकते। इसलिए नसीहत अवश्य दीजिए, मगर शर्मिंदा न कीजिए क्योंकि उद्देश्य दस्तक देना है, दरवाजा तोड़ना नहीं। बाकी:- कभी-कभी किसी को जीते जी भी कंधा दीजिए, जरूरी नहीं कि हर रस्म मौत के बाद ही निभाई जाए ।

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