सच का तमाशा और झूठ की तारीफ
संपादकीय
28 फरवरी 2025।
*सच का तमाशा और झूठ की तारीफ*
व्यर्थ का खर्चा और व्यर्थ की चर्चा जीवन की व्यवस्था और मन की अवस्था को प्रभावित करते हैं। यह एक कटु सच्चाई है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए। संघर्ष के अंधेरे से अपने हौसले कमजोर ना होने दें, क्योंकि समय का ग्रहण तो सूर्य और चंद्रमा भी झेलते हैं।
हकीकत में तमाशा तो सच का ही होता है, हमेशा झूठ की तो तारीफ होती है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई है जिसे हमें समझना चाहिए। चुगली की धार इतनी तेज होती है कि खून के रिश्तों को भी काट कर रख देती है। यह एक खतरनाक सच्चाई है जिसे हमें समझना चाहिए। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हमें अपनी गलतियों की सज़ा अभी भले न मिले, परंतु समय के साथ कभी ना कभी अवश्य मिलती है। यह एक कटु सच्चाई है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिए। हमारी जिंदगी में होने वाली हर चीज के जिम्मेदार हम ही होते हैं, इस बात को जितनी जल्दी मान लोगे, जिंदगी उतनी बेहतर होती जाएगी।
इसलिए, हमें अपने जीवन में संघर्ष और सच्चाई का महत्व समझना चाहिए। हमें अपने हौसले कमजोर ना होने देने चाहिए और समय के साथ चलना चाहिए। हमें अपनी गलतियों की सज़ा को स्वीकार करना चाहिए और अपने जीवन में सुधार करना चाहिए।
जीवन की व्यवस्था और मन की अवस्था को प्रभावित करने वाले व्यर्थ के खर्चे और व्यर्थ की चर्चा से बचना चाहिए। संघर्ष के अंधेरे से अपने हौसले कमजोर ना होने देने चाहिए और समय के साथ चलना चाहिए। हमें अपनी गलतियों की सज़ा को स्वीकार करना चाहिए और अपने जीवन में सुधार करना चाहिए।
सच और झूठ के बीच का संघर्ष एक पुरानी और अनंत कहानी है। यह एक ऐसा संघर्ष है जो हमेशा से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। लेकिन इस संघर्ष में एक बात स्पष्ट है कि सच परेशान हो सकता है, लेकिन परास्त नहीं हो सकता।
झूठ के सहारे कितना ही बड़ा प्लेटफार्म खड़ा कर दिया जाए, लेकिन ज्यादा समय तक चल नहीं सकता। झूठ के जड़े नहीं होते हैं और धरातल भी सीमित होता है। लेकिन झूठ का अस्तित्व देखने में कुछ प्रभावकारी होता है। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे हमें समझना चाहिए। सच और झूठ के फर्क को समझने के लिए मनुष्य को प्रयास करना चाहिए। सच के पक्ष में मिलने वाली दलीलें भले ही कमजोर हों, लेकिन मजबूत होती हैं। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे हमें समझना चाहिए।
इसलिए, हमें सच के पक्ष में खड़े होना चाहिए और झूठ के खिलाफ लड़ना चाहिए। हमें सच की महत्ता को समझना चाहिए और झूठ के प्रभाव को कम करना चाहिए। अंत में पुनः कह देता हूं कि यह एक ऐसा संघर्ष है जो हमेशा से चला आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। लेकिन इस संघर्ष में एक बात स्पष्ट है कि सच परेशान हो सकता है, लेकिन परास्त कभी नहीं हो सकता।
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