घोड़ी पर बैठने, व न बैठने देनी की ज़िद
संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार
17 फरवरी 2025
*घोड़ी पर बैठने, व न बैठने देनी की ज़िद*
घोड़ी पर बैठने की रस्म और इसके पीछे की सामाजिक और सांस्कृतिक कहानी एक जटिल मुद्दा है। एक तरफ यह परंपरा सदियों पुरानी है, और भारतीय शादियों में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन दूसरी तरफ यह परंपरा आज भी दलित वर्ग को घोड़ी पर न बैठने देने की जिद को बढ़ावा देता है, जो सामाजिक असमानता को दर्शाता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
घोड़ी पर बैठने व न बैठने देने की ज़िद कही परंपराएं, तो कहीं सामंती दकियानूसी सोच के चलते सामाजिक व्यवस्था में विषाक्त घुला हुआ है। विवाह शादी में घोड़ी पर बैठने की रस्म और कहीं-कहीं आज भी दलित वर्ग को घोड़ी पर न बैठने देने की जिद सामाजिक असमानता को दर्शाता है। आजादी के इस टेक्निकल युग में घोड़ी पर बैठने को लेकर हो रहे टकराव सामाजिक सद्भाव और देश हित के लिए शर्मनाक घटनाएं हैं।
एक तरफ हम शिक्षित होने का दावा करते हैं वहीं दूसरी ओर विषाक्त मानसिकता का परिचय देते हुए कुंठित परंपराओं के पालन में शक्ति प्रदर्शन करते देखे जा सकते हैं । लेकिन परंपराओं को तोड़ने का यह तरीका भी ठीक नहीं है सामाजिक समझाइए और संवाद द्वारा भी ऐसी समस्याओं का समाधान निहित है, लेकिन चुनौती देकर किसी परंपरा को खत्म करना खतरे से खाली नहीं है, हालांकि शक्ति प्रदर्शन द्वारा किसी परंपरा में फेरबदल हो जाए लेकिन इसका स्थाई समाधान तो नहीं है। जब तक लोगों की रुग्ण मानसिकता का इलाज संभव नहीं तब तक ऐसी समस्या का समाधान की वजह व्यवधान बढ़ाने की संभावनाएं ज्यादा बनी रहती हैं। इन दिनों झुंझुनू जिले में दो ऐसी घटनाएं सामने आई जिसमें शिक्षित जिले कहलाने के साथ कुंठित मानसिकता का परिचय भी देखने को मिला है। बुहाना उपखंड के मेघपुर में दलित मजदूर द्वारा मटके से पानी पीने पर बेरहमी से पीटने व उसे बंधक बनाकर मटके के नुकसान के एवेज में पैसे मांगने जैसी घटना है। तो दूसरी तरफ खेतड़ी उपखंड के रामपुर के गोविंददासपुरा गांव में घोड़ी पर बैठाकर निकासी निकालने के लिए पुलिस की मदद मांग कर चार थानों सहित विशेष फोर्स तक बुलाने की नौबत वाली घटनाएं यहां कई सवालिया निशान खड़ी करती है।
माना कि आज भी कई सडी गली परंपरा समाज में विषाक्तता बनाई हुई है। इन समस्याओं का समाधान दोनों ही पक्षों द्वारा शक्ति प्रदर्शन करने से समाधान संभव नहीं है सामाजिक संवाद द्वारा समाधान संभव था। लेकिन यह प्रयास के मार्ग में अपना कर चुनौतियों से टकरा हुआ यह समाज के ताने अपने को दूषित कर रहा है।
क्या खेतड़ी के गोविंददासपुरा मैं घोड़ी से निकासी निकालने की घटना ने अन्य लोगों के लिए रास्ता खोल दिया या फिर तनाव का माहौल पैदा किया। यहां सवाल यह भी उत्पन्न होता है यदि इस परंपरा को तोड़ने के लिए सामाजिक सद्भाव और समन्वय स्थापित कर किया जाता तो निश्चित रूप से आने वाली पीढियां के लिए यह सुकून लायक रास्ता होता। जिन असामाजिक तत्वों ने घोड़ी पर न बैठने देने के पक्ष में अपना अधिकार मानने वाले वे लोग तो दोष के भागी हैं। लेकिन ऐसे निर्दोष लोगों को भी अकारण ही संभावित इस घटना के लिए शामिल किया गया। उन्हें शांति भंग का नोटिस मिला। दलित वर्ग के प्रति कहीं उनका सॉफ्ट कॉर्नर था लेकिन इस घटना के बाद उनकी रहमत खत्म होना संभावित माना जा सकता है। सामाजिक अशांति के लिए न्यूसेंस पैदा करने वालों कहीं ना कहीं ताकत मिली है।
वहीं दूसरी पक्ष का नजरिया देखा जाए तो सवाल यह उत्पन्न होता है कि इस परंपरा को सामाजिक सद्भाव से भी समाप्त किया जा सकता था। संवाद के जरिए यदि प्रयास किया जाता तो निश्चित रूप से इस परंपरा में बदलाव की संभावना ज्यादा माकूल होती । इस घटना से जो बदबू उठी है उससे सामाजिक ताना-बाना जरूर दूषित हुआ है। उसके बारे में विचार करने की जरूरत है। क्या यह परंपरा तोड़ने का कार्यक्रम था या फिर अपने अधिकारों की शिक्षा पाकर शक्ति प्रदर्शन का कार्यक्रम था हालांकि जो भी है यह घटनाएं दोनों ही पक्ष से निंदनीय है। जो लोग कुत्ता बिल्ली घोड़े आदि पशु पलते हैं और उन पशुओं को अपने रिश्तेदार मानते हैं। उनकी भावनाओं को आहट कर उस पर बैठना भी कोई अच्छी बात नहीं है। घोड़ी पर बैठने व न बैठने की जिद करना दोनों ही बात अच्छी नहीं है। आज टेक्नोलॉजी का जमाना है वर्ल्ड ग्लोबलाइजेशन के इस युग में अधुनातन यंत्रों के प्रयोग द्वारा भी परंपराओं में करवट बदली जा सकती है। दोनों ही पक्षों की ओर से सामाजिक समझाइए का मार्ग ज्यादा कारगर साबित होता।
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