शिक्षा में सुधार के लिए तबादला पॉलिसी बनना क्यों जरूरी?
संपादकीय-@एडवोकेट हरेश पंवार
29दिसम्बर2024
*शिक्षा में सुधार के लिए तबादला पॉलिसी बनना क्यों जरूरी?*
शिक्षा विभाग में तबादले की खबर आते ही हलचल सी मच जाती है। दूरदराज़ के जिलों में बैठे शिक्षक लोग अपने गृह जिले में आने को आतुर हो जाते हैं, तो दूसरी और खुद के गृह जिले में बैठी शिक्षक लॉबी सरकार के पक्षधर नेताओं के यहां चिलम भरना शुरू कर देते हैं। जैसे ही सरकार बदलती है वैसे ही कुछ तथाकथित शिक्षक नेता अपनी चिलम की साफ़ी झाड़कर गिरगिट की तरह रंग बदलने में देर नहीं करते हैं। क्योंकि उन्हें सबसे बड़ा जो डर सताता है। वह जानता है कहीं उसका तबादला ना हो जाए। इस बात को लेकर कई शिक्षक तो नेताओं के प्रवक्ता तक बने हुए हैं । उनके प्रचार प्रसार और कार्यक्रमों के आयोजनों के लिए व्यवस्थापक बने हुए हैं। वे चंदा उगाई के तो मास्टरमाइंड पॉलिसी मेकर है। ताजूब की बात तो यह है कि कई मास्टरमाइंड शिक्षकों के तो तबादले ही नहीं होते हैं। सरकार किसी की भी आ जाए, उन्हें कोई छेड़ता ही नहीं। आखिर चुनाव के परिणाम आते ही वे रंग बदलू दुपट्टा गले में डालकर सरकार के प्रतिनिधि नेताओं के यहां गाजते रहते हैं। ऐसे लोग बढ़िया दुकानदारी करते हैं।
विशेष कर राजस्थान प्रदेश की यदि बात करें, तो सरकारी विद्यालयों का ढांचा गर्त में जा चुका है। हर व्यक्ति की सोच है कि उनका बच्चा सरकारी मुलाजिम बने, बच्चों के रिश्ते के लिए सरकारी नौकरी वाले की ही तलाश में बाल विवाह नहीं, बल्कि बच्चों के विवाह की उम्र निकलती जा रही है। सरकारी स्कूल, कॉलेज में पढ़ाई नहीं होती बल्कि प्राइवेट स्कूल, कॉलेज में पैसे में डिग्रियां लेकर बच्चे झोला भरकर लिए फिर रहे हैं। सरकारी नौकरी पाने के लिए मोटी रकम देकर कंपटीशन की तैयारी के लिए कोचिंग में भीड़ लगी हुई है। नौकरी लगने के बाद नैतिक सिद्धांत भाड़ में जाए नेताओं के यहां जुगाड़ बैठक नजदीक से नौकरी मिल जाए आराम से टाइम पास हो जाए बस यही मानसिकता बन गई है। हर किसीकी ओर यदि बटवा वाली बहू मिल जाए तो कहना ही क्या ? लोगों की अवधारणा बन चुकी है की भगत सिंह पैदा हो लेकिन पड़ोसी के घर में, उनके घर में तो अडानी अंबानी ही पैदा हो। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
सरकारी नौकरी हो और घर के पास हो वह व्यक्ति सामाजिक व्यवस्था के निर्माण की बजाय व्यवस्था में व्यवधान पैदा करने के अलावा और कुछ नहीं कर पा रहा है।पति-पत्नी की सरकारी नौकरी घर के नजदीक या गृह जिले में मिल रही है। वे नौकरी नहीं कर रहे, वह मौज मस्ती कर रहे हैं। उन्हें अपने दायित्व की जिम्मेवारी न निभा करके केवल नेतागिरी और नेताओं के यहां चमचागिरी कर रहे हैं। मेरी कड़वी बात सुनकर किसी को मिर्ची लगे तो मैं क्या करूं। लेकिन राजस्थान के शिक्षा विभाग के तबादला पॉलिसी नहीं होने की वजह से अवगत कराऊंगा जो राजस्थान के पाकिस्तान बॉर्डर इलाके के जिलों में नियुक्ति से लेकर रिटायरमेंट तक कभी अपने गांव का मुंह माथा नहीं देखा और तबादला के लिए सालों से इंतजार कर रहे हैं। पहले पहले तो बेचारे ने गांव के छुटभैया नेताओं से लेकर सरकार के वजीरों के यहां दफ्तरों में चप्पल घीस डाली। आज तक माई के लालों का तबादला नहीं हुआ। न तो उनके घर में ऐसा ऐसा सदस्य है जो उन नेताओं के यहां चिलम भराई का कार्य कर सके और मान मनुहर कर सके। हार थककर बेचारे उन शिक्षक कर्मचारियों ने दूसरे जिलों में जाकर अपना डेरा डाल लिया। कईयों ने अपने बूढ़े मां-बाप को गांव में छोड़े हुए हैं। उनकी विषम परिस्थितियों कैसे भी हो उनकी सुनने वाला कोई नहीं। या तो मजबूरी में अपने मां बाप को साथ ले गए और बच्चों को लेकर दूरदराज के जिले में बैठे हुए हैं और दूसरी तरफ कुछ ऐसे कर्मचारी भी हैं जिनकी पोस्टिंग गांव या गांव के नजदीक ढाणी ढपाणी में लग गई। वे मौज कर रहे हैं। गुलछर्रे रोज कर रहे हैं। स्कूलों में काम धाम कुछ नहीं करना यदि कहीं चुनाव आदि में ड्यूटी लग जाए या बीएलओ का चार्ज मिल जाए, या फिर जनगणना आदि में थोड़ा सा अतिरिक्त काम मिल जाए तो साहब उन शिक्षकों को लगता है की सरकार उनका खून पी रही है। कई बार तो नेताओं के यहां एप्रोच लगाकर ड्यूटी कटवाने की पूरी धौंश दिखाते हुए देखा जा सकता है।
शीतकालीन छुट्टियों में सीमावर्ती इलाकों में हार्ड स्टेशन पर ड्यूटी करने वाले बेचारे शिक्षक गांव के पंच पटेलों को लेकर ले देकर तबादले करवाने की बात को लेकर नेताओं के यहां भी देखे जा सकते हैं। कौन सुनने वाला है उनकी। जिनकी अप्रोच है, वे दांये बाये बगले झाक रहें हैं लेकिन माई का लाल कोई इन शिक्षकों को हटा दे तो जाने, जो 25-30 सालों से बहुत से शिक्षक एक ही गांव में जड़ जमाए बैठे हैं। भला उन्हें कौन हटा दे। वह गांव के हर व्यक्ति के मुंह में अंगुली दे देकर उनकी आदतों को पहचान चुके हैं। और कोई शिकायत कर दे तो गांव में शिकायतकर्ता के खिलाफ आंदोलन तक खड़ा कर देते हैं। क्योंकि गांव में ब्याज भट्टी के रुपए धैले देकर लोगों की आर्थिक कमजोरी के सहायक भी तो बने हुए हैं। तबादला नीति बनाना सरकार के लिए मामला तो है कठिन और थर्ड ग्रेड के शिक्षकों को ट्रांसफर करना शेर की मयांद में शरण लेने के समान है। इसलिए सरकार को शिक्षा विभाग की नामांकन स्थिति को सुधारने और शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए तबादला नीति बनाना बहुत जरूरी है। जिस शिक्षक ने राजस्थान के कई ऐसे जिले हैं जिन्हें हार्डकोर स्टेशन माना जाता है। उन जिलों में अपनी सर्विस के दौरान कभी ड्यूटी नहीं की हो तब तक उसका प्रमोशन ना हो। एक निश्चित समयावधि के बाद तबादला अनिवार्य हो। जैसा केंद्रीय विद्यालय संगठन में हर 4 साल बाद ट्रांसफर नीति बनी हुई है। डिजायर सिस्टम को नकारा जाना चाहिए। तब जाकर कहीं प्रशासनिक सुधार होगा। शिक्षण संस्थान और शिक्षक को राजनीति से दूर किया जाना अति आवश्यक है। शिक्षा नीति में यह तबादला नीति ही शिक्षा की वर्तमान स्थिति को गर्दीश से बाहर निकाल कर शिक्षा के उत्थान में कारगर अभियान साबित हो सकेगा।
आज सरकारी स्कूलों की स्थिति यह है जिस विद्यालय में 120 बच्चे सीनियर सेकेंडरी में है। वह अपने आप को सम्मानजनक स्थिति में मान रहे हैं। इतनी छात्र संख्या कभी एक कक्षा की वह करती थी लेकिन अभी स्थितियां भिन्न है और फैकल्टी की बात करें तो सरकार का बड़ा घाट का सौदा नजर आएगा। सोचने वाली बात यह है की हर साल लाखों हजारों बीएड डिग्री प्राप्त करके सरकारी नौकरी लगने की अभिलाषा में बैठे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। शिक्षा विभाग में शिक्षकों के स्थानीय प्रभाव को हटाने की अनिवार्यता होनी चाहिए। जिस प्रकार से पुलिस महकमे में थानेदार को गृह जिले में नियुक्ति नहीं मिलती। वैसे शिक्षा विभाग में बने तब जाकर शिक्षा का ढांचा सुधरे। शिक्षा का बेड़ा गर्क करने में महत्वपूर्ण कारक नेताओं की डिजाइन सिस्टम है। नेताओं के यहां नेतागिरी करने वाले चुगलखोरों की जमात में देखी जा सकती है।
हालांकि शिक्षा में सुधार के लिए केवल शिक्षक को कक्षा कक्ष और शिक्षण अधिगम कार्य तक सीमित रखना चाहिए ।
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