परिवर्तन की धारा में बहना ही जीवन का सार

संपादकीय@ एडवोकेट हरेश पंवार 
26 दिसंबर 2024

 *परिवर्तन की धारा में बहना ही जीवन का सार* 
परिवर्तन जीवन का एक अनवृत क्रम है, जिसमें स्वयं को समायोजित करना ही श्रेयष्कर है। यह विचार हमें जीवन की वास्तविकता को समझने में मदद करता है। हम उन चीजों को सभालने की कौशिश में लगे हुए हैं, जो सदा एक जैसी नहीं रह सकती। अवस्था भी हमारी नित्य बदल रही है। जैसे हम कल थे, वैसे आज नहीं है और जैसे आज हैं, वैसे कल नहीं रहेंगे। शरीर का कोई भरोसा नहीं है । इसलिए जो श्रेष्ठ कर्म करना चाहो, वो तुरंत कर लेना, समय कभी भी किसी का इंतज़ार नहीं करता। परिवर्तन की धारा में बहना ही जीवन का सार है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

परिवर्तन जीवन का शाश्वत क्रम है, उसमें स्वयं को समायोजित करना ही है श्रेयष्कर हम उन चीजों को सभालने की कौशिश में लगे हुए हैं, जो सदा एक जैसी नहीं रह सकती। अवस्था भी हमारी नित्य बदल रही है। जैसे हम कल थे, वैसे आज नहीं है और जैसे आज हैं, वैसे कल नहीं रहेंगे। शरीर का कोई भरोसा नहीं है । इसलिए जो श्रेष्ठ कर्म करना चाहो, वो तुरंत कर लेना, समय कभी भी किसी का इंतज़ार नहीं करता।
    वहीं विचारों की भी अराजकता हमारे भीतर चल रही है। रोज नये विचार , नये उद्देश्य, नई दौड़ व नई उमंग होती है। आप स्वयं भी तो अपने भीतर हो रहे परिवर्तन को देख रहे हो। आप भी तो नित्य बदल रहे हो, फिर दूसरों के बदल जाने पर क्रोध क्यों करते हो ? परिवर्तन जीवन का साश्वत क्रम है, उसमें स्वयं को समायोजित करना ही श्रेयष्कर है।
         
विचारों की भी अराजकता हमारे भीतर चल रही है। रोज नये विचार , नये उद्देश्य, नई दौड़ व नई उमंग होती है। आप स्वयं भी तो अपने भीतर हो रहे परिवर्तन को देख रहे हो। आप भी तो नित्य बदल रहे हो, फिर दूसरों के बदल जाने पर क्रोध क्यों करते हो ? परिवर्तन जीवन का साश्वत क्रम है, उसमें स्वयं को समायोजित करना ही श्रेयष्कर है।

इसलिए, हमें जीवन की वास्तविकता को समझना चाहिए और परिवर्तन को स्वीकार करना चाहिए। हमें अपने विचारों और भावनाओं को नियंत्रित करना चाहिए और दूसरों के बदलने पर क्रोध नहीं करना चाहिए। परिवर्तन जीवन का एक साश्वत क्रम है, और हमें इसे स्वीकार करना चाहिए।

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