खबर या खौफ — पत्रकारिता का बदलता चेहरा और समाज की चिंता

संपादकीय@हरेश पंवार #04.04.2026

*खबर या खौफ — पत्रकारिता का बदलता चेहरा और समाज की चिंता*
वर्तमान समय में पत्रकारिता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ “खबर” और “खौफ” के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है। कभी समाज को दिशा देने वाली, जागरूकता फैलाने वाली और सच्चाई का आईना मानी जाने वाली पत्रकारिता आज कई बार सनसनी, भय और टीआरपी की दौड़ में उलझती नजर आती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या हम वास्तव में खबर देख रहे हैं, या केवल खौफ का प्रसार हो रहा है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

बीते कुछ वर्षों में मीडिया के स्वरूप में तेजी से बदलाव आया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने हर व्यक्ति को “खबरवीस” बनने का अवसर दिया है। यह लोकतांत्रिक दृष्टि से सकारात्मक भी है, लेकिन इसके साथ ही एक गंभीर संकट भी उत्पन्न हुआ है—पत्रकारिता की मर्यादा और मानदंडों का ह्रास। आज अनेक यूट्यूबर और सोशल मीडिया चैनल बिना किसी संपादकीय जिम्मेदारी के खबरों को इस प्रकार प्रस्तुत कर रहे हैं कि अपराध का विवरण ही मुख्य आकर्षण बन जाता है, जबकि उसके सामाजिक, मानवीय और नैतिक पक्ष को दरकिनार कर दिया जाता है।

अपराध की घटनाओं की रिपोर्टिंग आवश्यक है, क्योंकि समाज को सच जानने का अधिकार है। लेकिन जब अपराध को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि वह एक प्रकार का “मनोरंजन” या “सनसनी” बन जाए, तब यह पत्रकारिता के मूल उद्देश्य से भटकाव है। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि अपराधी से अधिक “खबर” ही अपराध को बढ़ावा दे रही है। घटनाओं का इतना विस्तृत और भड़काऊ चित्रण किया जाता है कि वह लोगों में भय, असुरक्षा और नकारात्मकता का वातावरण बना देता है।

इस स्थिति का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि समाज का सकारात्मक पक्ष धीरे-धीरे खबरों से गायब होता जा रहा है। जहाँ पहले प्रेरणादायक कहानियाँ, सामाजिक सुधार, शिक्षा, संस्कृति और विकास की खबरें प्रमुखता से दिखाई देती थीं, वहीं अब उनकी जगह अपराध, विवाद और सनसनी ने ले ली है। यह बदलाव केवल दर्शकों की पसंद का परिणाम नहीं है, बल्कि मीडिया संस्थानों की उस सोच का भी प्रतिबिंब है, जो टीआरपी और व्यूज़ को प्राथमिकता देती है।

घटना घटित होने के बाद जिस प्रकार से कानून व्यवस्था को दरकिनार कर सड़कों पर “न्याय” की मांग की जाती है, वह भी एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है। धरना, प्रदर्शन, सड़क जाम और सोशल मीडिया ट्रायल के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास न केवल कानून के लिए चुनौती है, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय है। “बुलडोजर संस्कृति” जैसी प्रवृत्तियाँ भी इसी मानसिकता का विस्तार हैं, जहाँ त्वरित न्याय के नाम पर प्रक्रिया और संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी की जाती है।

इस पूरे परिदृश्य में पत्रकारिता की भूमिका और जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। पत्रकार केवल सूचना का वाहक नहीं होता, बल्कि वह समाज का मार्गदर्शक भी होता है। यदि वही भय, भ्रम और असंतुलन को बढ़ावा देने लगे, तो समाज में विश्वास का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। अखबार और मीडिया पर जो भरोसा “गजट नोटिफिकेशन” के समान माना जाता था, यदि वह कमजोर पड़ता है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि मीडिया संस्थान, पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर आत्ममंथन करें। प्रतिस्पर्धा होना स्वाभाविक है, लेकिन यह प्रतिस्पर्धा समाज के हितों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। खबरों में संतुलन, संवेदनशीलता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को बनाए रखना अनिवार्य है। अपराध की खबर दिखाना जरूरी है, लेकिन उसके साथ-साथ समाज को सकारात्मक दिशा देने वाली खबरों को भी स्थान देना उतना ही महत्वपूर्ण है।

सोशल मीडिया के इस युग में दर्शकों की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। हमें यह तय करना होगा कि हम किस प्रकार की खबरों को प्रोत्साहित कर रहे हैं। यदि हम केवल सनसनी और भय को देखने में रुचि लेंगे, तो मीडिया भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगा। इसलिए जागरूक दर्शक बनना भी समय की मांग है।

अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि पत्रकारिता आज एक चौराहे पर खड़ी है—एक रास्ता उसे “खबर” की गरिमा और सामाजिक जिम्मेदारी की ओर ले जाता है, जबकि दूसरा रास्ता “खौफ” और सनसनी की ओर। निर्णय मीडिया और समाज दोनों को मिलकर लेना है कि वे किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं।

यदि समय रहते हमने इस पर गंभीर चिंतन नहीं किया, तो वह दिन दूर नहीं जब खबरों से विश्वास उठ जाएगा और पत्रकारिता का स्वाभिमान भी संकट में पड़ जाएगा। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—हम खबर देखना चाहते हैं या खौफ महसूस करना चाहते हैं?

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