अंतिम सफर में पद नहीं, रिश्ते साथ चलते हैं
संपादकीय@ हरेश पंवार # 28मई 2026
*अंतिम सफर में पद नहीं, रिश्ते साथ चलते हैं*
मनुष्य का जीवन एक लंबी यात्रा की तरह है, जिसमें वह जन्म से लेकर अंतिम सांस तक सफलता, सम्मान, संपत्ति और पहचान पाने के लिए निरंतर संघर्ष करता रहता है। कोई ऊंचे पद की दौड़ में लगा है, कोई बैंक बैलेंस बढ़ाने में व्यस्त है और कोई अपने अहंकार को ही अपनी उपलब्धि मान बैठता है। लेकिन जीवन की ढलती शाम एक ऐसा आईना होती है, जहाँ हर भ्रम टूटने लगता है। तब इंसान को एहसास होता है कि उसने जिन चीजों को जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझा था, वे वास्तव में क्षणिक थीं। अंत में यदि कुछ स्थायी रहता है, तो वह हैं—रिश्ते, यादें और इंसानियत से कमाई गई दुआएं। मैं यहां बोलेगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आज का दौर भौतिकता और प्रतिस्पर्धा का दौर बन चुका है। इंसान अपनी पहचान को अपने पद, पैसे और प्रभाव से जोड़ने लगा है। समाज में भी अक्सर व्यक्ति का मूल्यांकन उसके बैंक बैलेंस और रसूख से किया जाता है। यही कारण है कि लोग रिश्तों से ज्यादा करियर को, संवेदनाओं से ज्यादा संपत्ति को और इंसानियत से ज्यादा अहंकार को महत्व देने लगे हैं। लेकिन समय का चक्र जब घूमता है और जीवन ढलान पर पहुंचता है, तब यही चमक फीकी पड़ने लगती है।
रिटायरमेंट के बाद अक्सर देखा जाता है कि जिस व्यक्ति के आगे-पीछे कभी लोगों की भीड़ रहती थी, जिसके एक फोन पर काम हो जाया करते थे, वही व्यक्ति धीरे-धीरे अकेलेपन का शिकार हो जाता है। जिस कुर्सी के अहंकार में वह खुद को सबसे ऊपर समझता था, वह कुर्सी कुछ ही दिनों में किसी और की हो जाती है। तब उसे एहसास होता है कि पद स्थायी नहीं, बल्कि केवल जिम्मेदारी का एक अस्थायी अवसर था। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कई लोग इस अवसर को सेवा के बजाय अहंकार का माध्यम बना लेते हैं।
इसी प्रकार धन भी जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन है, लेकिन जब यही साधन जीवन का लक्ष्य बन जाता है, तब रिश्ते पीछे छूटने लगते हैं। लोग तिजोरियां भरने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपनों के लिए समय ही नहीं बचता। बच्चे बड़े हो जाते हैं, माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं, दोस्त दूर हो जाते हैं, लेकिन इंसान सोचता रहता है कि वह “भविष्य सुरक्षित” कर रहा है। विडंबना यह है कि भविष्य की चिंता में वह वर्तमान के सबसे खूबसूरत पल खो देता है।
जीवन के अंतिम पड़ाव पर इंसान अपनी उपलब्धियों की फाइलें नहीं खोलता, बल्कि यादों की किताब पलटता है। उसे याद आते हैं बचपन के वे दिन, परिवार के साथ बिताए गए पल, दोस्तों की हंसी, किसी जरूरतमंद की मदद करने का संतोष और समाज के लिए किए गए छोटे-छोटे अच्छे कार्य। यही वे क्षण होते हैं जो आत्मा को सुकून देते हैं। उस समय ना बैंक बैलेंस दिल को शांति देता है और ना ही ऊंचा पद। यदि कुछ मायने रखता है, तो वह है लोगों के दिलों में आपके लिए बचा सम्मान और प्रेम।
इतिहास भी यही सिखाता है। विश्व विजेता सिकंदर जब दुनिया से विदा हुआ, तो उसके हाथ खाली थे। वह पूरी दुनिया जीत सका, लेकिन जीवन की अंतिम सच्चाई से नहीं जीत पाया। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि इंसान चाहे कितना भी धन और शक्ति अर्जित कर ले, अंत में सब यहीं रह जाना है। साथ केवल वही जाता है, जो उसने लोगों के दिलों में कमाया हो।
आज समाज में बढ़ती कटुता, अकेलापन और मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण यही है कि इंसान ने रिश्तों को पीछे छोड़ दिया है। सोशल मीडिया पर हजारों संपर्क होने के बावजूद लोग भीतर से अकेले हैं। कारण स्पष्ट है—रिश्ते केवल दिखावे और औपचारिकताओं से नहीं चलते, उन्हें समय, संवेदना और अपनापन चाहिए। यदि जीवनभर इंसान केवल अपने अहंकार और स्वार्थ में जीता रहेगा, तो अंतिम समय में उसके पास याद करने के लिए भी बहुत कम बचेगा।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन के वास्तविक अर्थ को समझें। पद, पैसा और प्रतिष्ठा जरूरी हैं, लेकिन वे जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं। वे केवल साधन हैं, साध्य नहीं। यदि सफलता के साथ विनम्रता नहीं है, यदि संपत्ति के साथ संवेदना नहीं है और यदि उपलब्धियों के साथ रिश्तों की गर्माहट नहीं है, तो जीवन अधूरा है।
आज जरूरत है कि हम अपने व्यस्त जीवन में अपनों के लिए समय निकालें। माता-पिता के साथ बैठें, बच्चों के साथ मुस्कुराएं, मित्रों का हाल पूछें और समाज के लिए कुछ निस्वार्थ कार्य करें। क्योंकि अंत में वही लोग आपके लिए रोएंगे, जिनके दिलों में आपने जगह बनाई होगी।
अंततः यह समझना होगा कि जीवन की असली कमाई तिजोरी में जमा धन नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में जमा प्रेम और विश्वास है। अंतिम यात्रा में ना ऊंचा पद साथ चलता है, ना बैंक बैलेंस और ना अहंकार। यदि कुछ साथ चलता है, तो वह हैं—आपकी यादें, आपके रिश्ते और आपके द्वारा कमाई गई दुआएं। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
“मनुष्य की असली पहचान उसके पद, पैसे या प्रसिद्धि से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह कमजोर, जरूरतमंद और असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। क्योंकि ऊँचा वही नहीं जो ऊँचे मंच पर बैठा हो, बल्कि ऊँचा वह है जिसके विचार और व्यवहार इंसानियत को ऊँचाई देते हों।”
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