दिखावे के रिश्तों के दौर में सच्ची मित्रता की तलाश

 संपादकीय @ हरेश पंवार # 17 मई 2026

*दिखावे के रिश्तों के दौर में सच्ची मित्रता की तलाश*
आज का समय अजीब विडंबनाओं का समय है। इंसान पहले से कहीं अधिक लोगों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर से उतना ही अकेला होता जा रहा है। मोबाइल की स्क्रीन पर हजारों “फॉलोअर्स”, सैकड़ों “फ्रेंड्स” और अनगिनत “लाइक्स” देखकर लोग स्वयं को लोकप्रिय समझने लगे हैं। किसी की पोस्ट पर हजार प्रतिक्रियाएं आ जाएं, तो उसे लगता है कि उसके पास अपार सामाजिक पूंजी है। लेकिन जीवन का वास्तविक सच तब सामने आता है, जब कठिन समय दरवाजे पर दस्तक देता है। उस समय यह भीड़ धीरे-धीरे गायब हो जाती है और केवल वही व्यक्ति बचता है, जो बिना स्वार्थ के हमारे साथ खड़ा रहता है। इसलिए किसी ने बिल्कुल सही कहा है—
“भीड़ इकट्ठा करने से कोई अमीर नहीं होता, संकट के समय जो ढाल बनकर खड़ा हो जाए, वही असली मित्र होता है।” यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

मानव जीवन में मित्रता केवल एक सामाजिक संबंध नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार होती है। मित्र वह नहीं जो केवल खुशियों में तालियां बजाए, बल्कि वह है जो असफलताओं के अंधेरे में भी आपका हाथ थामे रहे। आज समाज में रिश्तों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उनकी गहराई कम होती जा रही है। लोग संबंधों को भी अब उपयोगिता और लाभ के तराजू में तौलने लगे हैं। जब तक किसी से फायदा मिलता है, तब तक रिश्ता चलता है; जैसे ही स्वार्थ खत्म होता है, लोग दूरी बना लेते हैं।

सोशल मीडिया ने इस दिखावे को और बढ़ा दिया है। लोग अपनी जिंदगी की चमकदार तस्वीरें दिखाकर दूसरों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वे बेहद खुश और सफल हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि डिजिटल दुनिया की यह चमक कई बार भीतर की गहरी खालीपन को छिपाने का माध्यम बन जाती है। हजारों ऑनलाइन मित्र होने के बावजूद कई लोग मानसिक तनाव, अकेलेपन और अवसाद से गुजर रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि उनके पास “सुनने वाला” तो बहुत है, लेकिन “समझने वाला” कोई नहीं।

सच्चे मित्र की पहचान अच्छे समय में नहीं होती। अच्छे समय में तो हर कोई साथ खड़ा दिखाई देता है। जब व्यक्ति सफल होता है, धनवान होता है या प्रभावशाली पद पर होता है, तब उसके आस-पास लोगों की भीड़ लग जाती है। लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, उसके करीब आने की कोशिश करते हैं और स्वयं को उसका शुभचिंतक बताते हैं। लेकिन जैसे ही परिस्थितियां बदलती हैं, वही लोग धीरे-धीरे दूरी बना लेते हैं। यही कारण है कि जीवन का कठिन समय इंसान को रिश्तों की असली पहचान करवा देता है।

इतिहास और साहित्य ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां एक सच्चे मित्र ने किसी व्यक्ति का जीवन बदल दिया। संकट में दिया गया साथ केवल सहायता नहीं होता, बल्कि वह टूटते हुए मन को जीने की ताकत देता है। जब पूरा संसार विरोध में खड़ा हो और उस समय कोई एक व्यक्ति विश्वास के साथ कहे—“मैं तुम्हारे साथ हूं,” तो वही शब्द इंसान के लिए सबसे बड़ी पूंजी बन जाते हैं।

आज का समाज दिखावे की मित्रता में उलझता जा रहा है। लोग जन्मदिन की पोस्ट डालकर, महंगे उपहार देकर या सार्वजनिक प्रशंसा करके मित्रता का प्रदर्शन करते हैं। लेकिन वास्तविक मित्रता प्रदर्शन नहीं, बल्कि समर्पण मांगती है। सच्चा मित्र वह है जो आपकी अनुपस्थिति में भी आपका सम्मान बनाए रखे, आपकी गलतियों पर आपको टोक सके और जरूरत पड़ने पर कठोर सच कहने का साहस रखे।

यह भी सच है कि हर व्यक्ति को जीवन में बहुत अधिक मित्रों की आवश्यकता नहीं होती। यदि किसी इंसान के पास एक भी ऐसा व्यक्ति हो, जो उसके दुःख में ढाल बनकर खड़ा हो जाए, तो वह वास्तव में अमीर है। क्योंकि असली अमीरी बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उन रिश्तों से मापी जाती है जो कठिन समय में भी टूटते नहीं हैं।

आज जरूरत इस बात की है कि हम रिश्तों को संख्या की नजर से देखना बंद करें। हमें यह समझना होगा कि हजारों परिचितों की भीड़ से अधिक मूल्यवान वह एक इंसान है, जो हमारी खामोशी को भी समझ सके। रिश्तों में ईमानदारी, संवेदनशीलता और विश्वास को महत्व देना होगा। केवल स्वार्थ पर टिके संबंध लंबे समय तक नहीं चलते। वे अवसर के साथ बदल जाते हैं, जबकि सच्ची मित्रता समय और परिस्थितियों की हर परीक्षा में मजबूत होती जाती है।

समाज में बढ़ती मानसिक अशांति और अकेलेपन का एक बड़ा कारण यही है कि लोग संबंधों की गुणवत्ता से अधिक उनकी संख्या पर ध्यान देने लगे हैं। बच्चों को भी अब यह सिखाने की जरूरत है कि जीवन में लोकप्रिय होना जरूरी नहीं, बल्कि भरोसेमंद होना जरूरी है। मित्रता का अर्थ केवल साथ घूमना या तस्वीरें साझा करना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दुःख को महसूस करना है।

अंततः जीवन हमें यही सिखाता है कि भीड़ केवल शोर पैदा करती है, लेकिन सच्चा मित्र जीवन में सुकून लाता है। सुख के समय में साथ खड़े लोग तालियां बजा सकते हैं, लेकिन संकट के समय जो व्यक्ति ढाल बनकर खड़ा हो जाए, वही जीवन की सबसे बड़ी दौलत होता है।

इसलिए रिश्तों की भीड़ जुटाने से अधिक जरूरी है, एक ऐसा इंसान कमाना जो आपके बुरे वक्त में भी आपका हाथ न छोड़े। क्योंकि
“सौ मतलबी दोस्तों से वह एक सच्चा मित्र बेहतर है, जो अंधेरे में भी आपके साथ खड़ा रहे।”

 *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“रिश्तों की असली पहचान खुशियों की महफ़िल में नहीं, बल्कि कठिन समय की खामोशी में होती है। क्योंकि तालियां बजाने वाले बहुत मिल जाते हैं, पर गिरते हुए इंसान को संभालने वाले लोग ही जीवन की वास्तविक पूंजी होते हैं।”

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