मतभेद नहीं, मनभेद समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा

 संपादकीय @ हरेश पंवार #18 मई 2026

*मतभेद नहीं, मनभेद समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा*
किसी भी सभ्य और समृद्ध समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों या आधुनिक तकनीक से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां रहने वाले लोग एक-दूसरे के प्रति कितने संवेदनशील, सहनशील और सहयोगी हैं। समाज कोई मशीन नहीं, जिसे केवल नियमों और व्यवस्थाओं से चलाया जा सके। समाज एक जीवंत ताना-बाना है, जो विश्वास, प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान के धागों से बुना जाता है। जब ये धागे कमजोर पड़ने लगते हैं, तो समाज भीतर से बिखरने लगता है। आज दुर्भाग्य से हमारा सामाजिक ताना-बाना इसी संकट से गुजर रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

वर्तमान समय में मतभेद और मनभेद के बीच की दूरी तेजी से समाप्त होती जा रही है। विचारों में भिन्नता किसी भी लोकतांत्रिक और जीवंत समाज की पहचान होती है। हर व्यक्ति का सोचने का तरीका अलग हो सकता है। किसी मुद्दे पर अलग राय होना स्वाभाविक है और यही विविधता समाज को नई दिशा देती है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है, जब विचारों का मतभेद दिलों की दूरी यानी मनभेद में बदल जाता है। आज लोग असहमति को दुश्मनी समझने लगे हैं। यदि कोई व्यक्ति हमारे विचारों से सहमत नहीं है, तो हम उसे विरोधी मान लेते हैं। यही सोच समाज में कटुता और विभाजन को जन्म दे रही है।

आज सोशल मीडिया ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। वर्चुअल दुनिया में लोग हजारों लोगों से जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में वे अपने ही परिवार और पड़ोस से दूर होते जा रहे हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर होने वाली बहसें अब घरों तक पहुंच चुकी हैं। राजनीतिक विचारधाराओं, धार्मिक मुद्दों और सामाजिक विषयों पर होने वाली बहसें रिश्तों में कड़वाहट घोल रही हैं। कमेंट बॉक्स में लिखे गए शब्द कई बार वर्षों पुराने संबंधों को तोड़ देते हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि जब समाज में संवाद खत्म होने लगता है, तब अविश्वास बढ़ने लगता है।

पहले समाज में विचारों का मतभेद होते हुए भी मनभेद नहीं होते थे। गांवों की चौपालों में लोग अलग-अलग विचार रखते थे, फिर भी आपसी भाईचारा बना रहता था। चुनाव खत्म होते ही लोग फिर एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े दिखाई देते थे। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। अब राजनीतिक और वैचारिक मतभेद स्थायी दुश्मनी का रूप लेने लगे हैं। लोग विचारधाराओं के नाम पर रिश्तों को तोड़ रहे हैं। परिवारों के भीतर संवाद कम हो रहा है और अहंकार बढ़ रहा है।

यह भी सच है कि आधुनिक जीवनशैली ने इंसान को अधिक आत्मकेंद्रित बना दिया है। लोग “हम” से अधिक “मैं” के बारे में सोचने लगे हैं। सामूहिकता की भावना कमजोर होती जा रही है। पहले मोहल्ले और गांव एक परिवार की तरह होते थे। किसी के घर दुख आता था, तो पूरा समाज साथ खड़ा होता था। आज लोग अपने पड़ोसी तक को ठीक से नहीं जानते। रिश्तों की जगह औपचारिकताएं बढ़ रही हैं। संवेदनाएं कम हो रही हैं और स्वार्थ बढ़ता जा रहा है।

समाज तब मजबूत बनता है, जब उसमें मतभेदों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करने की संस्कृति हो। लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार है। लेकिन यदि हर असहमति को अपमान मान लिया जाए, तो समाज में तनाव और टकराव बढ़ना स्वाभाविक है। हमें यह समझना होगा कि विचारों की भिन्नता दुश्मनी का कारण नहीं हो सकती। कोई व्यक्ति हमसे अलग सोचता है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह हमारा विरोधी है। परिपक्व समाज वही होता है, जहां लोग बहस करते हैं, लेकिन रिश्ते नहीं तोड़ते।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संवाद की संस्कृति को फिर से मजबूत करें। जब लोग एक-दूसरे की बात सुनना बंद कर देते हैं, तब मनभेद जन्म लेते हैं। संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने की प्रक्रिया है। यदि हम अपनी बात कहने जितना धैर्य दूसरों की बात सुनने में भी दिखाएं, तो कई विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं।

शिक्षा और संस्कार की भी यहां महत्वपूर्ण भूमिका है। बच्चों को केवल तकनीकी ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सहनशीलता, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाना भी जरूरी है। यदि नई पीढ़ी केवल प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत सफलता को ही जीवन का लक्ष्य मानेगी, तो समाज में सहयोग और भाईचारे की भावना कमजोर होती जाएगी।

यह भी याद रखना होगा कि समाज की असली ताकत उसकी एकता में होती है। जिस समाज की ऊर्जा आपसी झगड़ों और मनमुटाव में खर्च हो जाएगी, वह कभी विकास की नई ऊंचाइयों को नहीं छू सकता। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों में आपसी विभाजन बढ़ा, वे भीतर से कमजोर हो गए। इसलिए मतभेदों को बौद्धिक विकास का माध्यम बनाइए, लेकिन मनभेदों को दिलों में जगह मत दीजिए।

अंततः, समाज की प्रगति केवल आर्थिक विकास से नहीं मापी जा सकती। असली विकास तब होगा, जब इंसानों के बीच विश्वास मजबूत होगा, रिश्तों में गर्मजोशी बनी रहेगी और लोग एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे। हमें यह समझना होगा कि विचारों की लड़ाई जीतकर भी यदि हम रिश्ते हार जाएं, तो वह जीत नहीं, समाज की हार है।

इसलिए आज सबसे बड़ी जरूरत यह है कि हम मतभेदों को स्वीकार करना सीखें, लेकिन मनभेदों को अपने जीवन से दूर रखें। क्योंकि जब दिलों के बीच की दूरी कम होगी, तभी एक समरस, मजबूत और संवेदनशील समाज का निर्माण संभव हो सकेगा।
[5/17, 23:54] Adv. Haresh Panwar: भीम प्रज्ञा अलर्ट 

“समाज को तोड़ने के लिए बड़ी साजिशों की नहीं, बल्कि दिलों में पैदा हुए छोटे-छोटे मनभेद ही काफी होते हैं। इसलिए विचार अलग हों तो भी रिश्तों में सम्मान और संवाद बनाए रखना ही सच्ची सभ्यता है।”

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