गांव की सरकार पर ताला: आखिर पंचायत चुनावों से क्यों डर रही सरकार?

संपादकीय@हरेश पंवार # 24-05-2026-

गांव की सरकार पर ताला: आखिर पंचायत चुनावों से क्यों डर रही सरकार?

लोकतंत्र की असली ताकत संसद और विधानसभा की ऊंची इमारतों में नहीं, बल्कि गांव की चौपालों में बसती है। भारत के संविधान निर्माताओं ने ग्राम पंचायतों को केवल प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों के रूप में परिकल्पित किया था। लेकिन राजस्थान में पंचायत चुनावों को लेकर जो स्थिति बनी हुई है, वह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रही है। राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा 31 जुलाई से पहले पंचायत चुनाव करवाने के निर्देश देने के बावजूद सरकार की मंशा साफ नजर नहीं आ रही। राजनीतिक बयानबाजी, तकनीकी बहाने और “वन स्टेट, वन इलेक्शन” जैसी अवधारणाओं की आड़ में पंचायत चुनावों को टालना लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ प्रतीत होता है।

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन सिंह राठौड़ द्वारा यह बयान देना कि जिन पंचायतों का कार्यकाल अभी बाकी है, उनके साथ ही चुनाव करवाने पर विचार किया जा रहा है, सुनने में प्रशासनिक सुविधा का तर्क लग सकता है, लेकिन सवाल यह है कि जिन पंचायतों का कार्यकाल एक वर्ष पहले समाप्त हो चुका है, वहां जनता को निर्वाचित प्रतिनिधि से वंचित रखने का अधिकार सरकार को किसने दिया? पंचायत राज कानून स्पष्ट रूप से समय पर चुनाव करवाने की बात करता है। यदि समय पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव हो सकते हैं, तो गांव की सरकार के चुनाव क्यों नहीं?

आज राजस्थान के हजारों गांवों में प्रशासकों के भरोसे पंचायतें चल रही हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था की जगह नौकरशाही का नियंत्रण बढ़ता जा रहा है। ग्राम पंचायतों में आमजन की आवाज दब चुकी है। ग्रामीण जब सड़क, पानी, सफाई, बिजली या नाली जैसी बुनियादी समस्याओं को लेकर पंचायत कार्यालय पहुंचते हैं, तो उन्हें जवाबदेही नहीं, बल्कि टालमटोल मिलती है। क्योंकि प्रशासक जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं होते, वे केवल आदेशों के प्रति उत्तरदायी होते हैं। यही कारण है कि गांवों में विकास कार्य ठप पड़े हैं और जनता निराशा में डूबी हुई है।

राजस्थान के ग्रामीण इलाकों का हाल किसी से छिपा नहीं है। गांवों की गलियां गंदगी से अटी पड़ी हैं, नालियां जाम हैं, पेयजल संकट विकराल रूप ले चुका है, आवारा पशुओं की समस्या बढ़ती जा रही है और विकास योजनाएं फाइलों में दम तोड़ रही हैं। पंचायतों में जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति ने गांव की लोकतांत्रिक आत्मा को कमजोर कर दिया है। गांव की सरकार जब जनता के हाथ में नहीं रहती, तब विकास का पहिया भी रुक जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम में चुनाव आयोग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। एक समय था जब मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने देश को यह एहसास कराया था कि चुनाव आयोग केवल औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि संविधान की एक शक्तिशाली प्रहरी है। उन्होंने राजनीतिक दबावों के आगे झुकने के बजाय चुनावी मर्यादाओं को स्थापित किया। लेकिन आज चुनाव आयोग की स्थिति ऐसी दिखाई देती है मानो वह सरकार के इशारों पर चलने वाली संस्था बनकर रह गया हो। यदि हाईकोर्ट को चुनाव करवाने के लिए फटकार लगानी पड़ रही है, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी का संकेत है।

“वन स्टेट, वन इलेक्शन” का विचार प्रशासनिक दृष्टि से आकर्षक लग सकता है, लेकिन इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की कीमत पर लागू नहीं किया जा सकता। यदि किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, तो वहां चुनाव करवाना संवैधानिक बाध्यता है, न कि राजनीतिक सुविधा का विषय। लोकतंत्र में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि जनता के विश्वास और भागीदारी का उत्सव होते हैं। जब चुनाव टलते हैं, तो जनता का भरोसा भी टूटता है।

सरकार को यह समझना होगा कि पंचायतें केवल राजनीतिक इकाइयां नहीं हैं। यही पंचायतें गांवों में विकास योजनाओं का संचालन करती हैं, सामाजिक समरसता बनाए रखती हैं और लोकतंत्र की पहली पाठशाला बनती हैं। यदि गांव की सरकार कमजोर होगी, तो लोकतंत्र का पूरा ढांचा खोखला हो जाएगा। पंचायत चुनावों को टालना केवल कानूनी उल्लंघन नहीं, बल्कि गांवों के विकास को अंधेरे में धकेलना है।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर उठकर तत्काल पंचायत चुनाव करवाए। लोकतंत्र में जनता से बड़ा कोई नहीं होता। गांव की जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार समय पर मिलना ही चाहिए। यदि सरकार वास्तव में “सुशासन” और “विकास” की बात करती है, तो उसे गांव की सरकार को मजबूत करना होगा, न कि उसे प्रशासकों के भरोसे छोड़ना होगा।

राजस्थान की जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि आखिर सरकार पंचायत चुनावों से डर क्यों रही है? लोकतंत्र में देरी भी अन्याय के समान होती है। गांवों का भविष्य फाइलों और बहानों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। अब समय आ गया है कि गांव की चौपालों में फिर से लोकतंत्र की आवाज गूंजे और जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से विकास की नई इबारत लिखे।

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