घर की मुस्कान से बड़ा कोई धर्म नहीं

 संपादकीय@ हरेश पंवार 29-05-2026
*घर की मुस्कान से बड़
आज का समाज एक अजीब विडंबना के दौर से गुजर रहा है। लोग बाहर की दुनिया में अपनी छवि चमकाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। कोई सोशल मीडिया पर गरीबों को खाना खिलाते हुए तस्वीरें डाल रहा है, कोई मंचों पर समाज सेवा के बड़े-बड़े भाषण दे रहा है, तो कोई दान-पुण्य कर खुद को महान साबित करने में लगा है। लेकिन यदि उसी व्यक्ति के घर के भीतर झांककर देखा जाए, तो अक्सर एक अलग ही तस्वीर दिखाई देती है। वहाँ बूढ़े माता-पिता उपेक्षा के दर्द में चुप बैठे मिलते हैं, जीवनसाथी भावनात्मक अकेलेपन से जूझता नजर आता है और बच्चे अपने ही घर में अपनापन तलाशते दिखाई देते हैं। यही वह कड़वी सच्चाई है, जिस पर समाज को गंभीर आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

वास्तविक इंसानियत की शुरुआत घर से होती है, न कि मंचों और कैमरों से। जो व्यक्ति अपने घर के लोगों को खुशी, सम्मान और सुकून नहीं दे सकता, उसकी बाहरी दुनिया की तमाम अच्छाइयाँ अक्सर एक बनावटी आवरण मात्र बनकर रह जाती हैं। यह सच स्वीकार करना होगा कि दुनिया की तालियाँ क्षणिक होती हैं, लेकिन अपने परिवार की आँखों में दिखाई देने वाला संतोष जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होता है।

माता-पिता वह नींव हैं, जिनकी कुर्बानियों पर हमारी पूरी जिंदगी खड़ी होती है। उन्होंने अपने सपनों को त्यागकर हमारी जरूरतों को पूरा किया, खुद की इच्छाओं को दबाकर हमारे भविष्य को संवारा। लेकिन आज आधुनिकता और व्यस्तता के नाम पर वही माता-पिता अकेलेपन का जीवन जीने को मजबूर हैं। दुख की बात यह है कि कई लोग समाज में सम्मान पाने के लिए बड़े-बड़े दान करते हैं, लेकिन अपने ही माता-पिता को समय देना उन्हें बोझ लगता है। यह परोपकार नहीं, बल्कि संवेदनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

जीवनसाथी केवल सामाजिक रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि जीवन की हर परिस्थिति में साथ चलने वाला साथी होता है। यदि वह व्यक्ति, जो आपके संघर्ष, असफलता और कमजोरी में आपके साथ खड़ा रहा, उसी को आप प्रेम, सम्मान और समय नहीं दे पा रहे, तो आपकी सारी उपलब्धियाँ अधूरी हैं। आज कई घरों में आर्थिक समृद्धि तो है, लेकिन भावनात्मक दिवालियापन भी उतना ही गहरा है। आलीशान मकानों में रहने वाले लोग भी भीतर से टूटे हुए हैं क्योंकि रिश्तों में संवाद, संवेदना और अपनापन समाप्त होता जा रहा है।

बच्चों के लिए भी सबसे बड़ी जरूरत महंगे खिलौने या बड़े स्कूल नहीं, बल्कि माता-पिता का समय और स्नेह है। एक बच्चा अपने पिता की व्यस्तता नहीं समझता, वह केवल इतना महसूस करता है कि उसके लिए समय नहीं है। यह आधुनिक जीवन की सबसे दुखद त्रासदी है कि लोग अपने बच्चों के भविष्य के लिए पैसा तो खूब कमा रहे हैं, लेकिन उनके वर्तमान से दूर होते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही है, जिसके पास सुविधाएँ तो हैं, लेकिन भावनात्मक सुरक्षा नहीं।

सच्चे मित्र भी जीवन की अमूल्य पूंजी होते हैं। ऐसे मित्र, जो बिना किसी स्वार्थ के आपके कठिन समय में ढाल बनकर खड़े रहते हैं, वास्तव में परिवार से कम नहीं होते। लेकिन आज स्वार्थ और दिखावे की दुनिया में लोग रिश्तों को भी उपयोग की वस्तु समझने लगे हैं। काम निकलते ही लोग अपने ही सच्चे साथियों को भूल जाते हैं। यह केवल कृतघ्नता नहीं, बल्कि चरित्र का पतन भी है।

आज सोशल मीडिया ने इंसान को ‘दिखावे का दानी’ बना दिया है। लोग कैमरे के सामने दया दिखाते हैं और कैमरा बंद होते ही संवेदनाएँ भी खत्म हो जाती हैं। इंसानियत अब प्रदर्शन का विषय बनती जा रही है। जबकि सच्ची नेकी वह होती है, जो बिना प्रचार और बिना प्रशंसा की अपेक्षा के की जाए। घर में अपनों के चेहरे पर मुस्कान लाना किसी मंदिर में चढ़ावे से कहीं बड़ा पुण्य है।

हमें यह समझना होगा कि दुनिया की नजरों में महान बनने से पहले अपने घर के लोगों की नजरों में अच्छा इंसान बनना जरूरी है। यदि आपके माता-पिता आपके व्यवहार से गर्व महसूस करते हैं, यदि आपका जीवनसाथी आपके साथ सुरक्षित और सम्मानित महसूस करता है, यदि आपके बच्चे आपकी मौजूदगी में खुश हैं और यदि आपके सच्चे मित्र आप पर भरोसा करते हैं—तो यही आपकी सबसे बड़ी सामाजिक उपलब्धि है।

जीवन अंततः तालियों से नहीं, रिश्तों से याद रखा जाता है। दुनिया की भीड़ आपको कुछ समय के लिए सम्मान दे सकती है, लेकिन अंतिम समय में आपके साथ वही लोग खड़े होंगे, जिन्हें आपने प्रेम और अपनापन दिया होगा। इसलिए समाज को सुधारने से पहले अपने घर के आंगन को खुशियों से भरना सीखिए। क्योंकि जिस इंसान के होने से उसके अपने खुश हों, वही वास्तव में एक अच्छा और सफल इंसान कहलाने का अधिकारी है। बाकी सब केवल रंगमंच का अभिनय है।

 *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“जिस इंसान के पास धन कम हो, लेकिन दिल में अपनापन, व्यवहार में विनम्रता और रिश्तों में सच्चाई हो—वह जीवन का सबसे अमीर व्यक्ति होता है। क्योंकि दौलत केवल सुविधाएँ खरीद सकती है, लेकिन प्रेम, विश्वास और सम्मान कमाने पड़ते हैं।”

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