उज्ज्वला की लौ क्यों पड़ गई मंद? महंगाई, गैस संकट और गांव की रसोई का बदलता सच

 संपादकीय@हरेश पंवार -31-05-2026

*उज्ज्वला की लौ क्यों पड़ गई मंद? महंगाई, गैस संकट और गांव की रसोई का बदलता सच*
भारत में जब प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत हुई थी, तब इसे ग्रामीण महिलाओं के जीवन में एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया गया। वर्षों से चूल्हे के धुएँ में जीवन बिताने वाली महिलाओं को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने का सपना दिखाया गया। उस समय यह कहा गया था कि अब गरीब परिवारों की माताओं और बहनों की आँखों में धुएँ के आँसू नहीं आएँगे। लाखों परिवारों को निःशुल्क गैस कनेक्शन और चूल्हे उपलब्ध कराए गए। यह एक सराहनीय पहल थी, जिसने ग्रामीण भारत की रसोई तक आधुनिक सुविधा पहुँचाई। लेकिन यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

किसी भी कल्याणकारी योजना की सफलता केवल उसके शुभारंभ से नहीं, बल्कि उसकी दीर्घकालिक उपयोगिता और आमजन तक पहुंच से तय होती है। एक समय था जब प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना को ग्रामीण भारत की महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली योजना के रूप में प्रस्तुत किया गया था। धुएं से भरी रसोई, जलती आंखें और लकड़ी-उपलों के बीच संघर्ष करती महिलाओं को गैस चूल्हे के माध्यम से सम्मानजनक जीवन देने का सपना दिखाया गया। करोड़ों गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन और चूल्हे वितरित किए गए। उस समय यह योजना ग्रामीण भारत में विकास और आधुनिकता का प्रतीक बन गई थी।

लेकिन आज एक दशक के आसपास का समय बीतने के बाद गांवों की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जिन घरों में उज्ज्वला योजना के गैस सिलेंडर पहुंचे थे, वहां अब अनेक स्थानों पर वे कोने में रखे दिखाई देते हैं। कई जगह सिलेंडर पानी के मटके रखने के स्टैंड या अन्य घरेलू उपयोग की वस्तु बन गए हैं। गरीब परिवारों की मजबूरी यह है कि गैस कनेक्शन तो मिल गया, लेकिन सिलेंडर भरवाने की आर्थिक क्षमता धीरे-धीरे समाप्त हो गई।

ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी समस्या आय और खर्च के बीच बढ़ता अंतर है। जिस बुजुर्ग महिला को महीने भर के गुजारे के लिए एक हजार या पंद्रह सौ रुपये पेंशन मिलती है, वह यदि लगभग उतनी ही राशि गैस सिलेंडर भरवाने में खर्च कर दे तो भोजन, दवाई और अन्य आवश्यक जरूरतों की पूर्ति कैसे करेगी? यही कारण है कि लाखों परिवार पुनः पारंपरिक चूल्हों की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं।

यह केवल गैस सिलेंडर की कीमत का प्रश्न नहीं है, बल्कि ग्रामीण जीवन शैली में आए व्यापक बदलाव का भी विषय है। गैस के आगमन के बाद लोगों ने धीरे-धीरे अपने पारंपरिक संसाधनों को छोड़ दिया। पहले गांवों में गोबर के उपले, सूखी लकड़ियां, फसलों के डंठल, झाड़ियां और अन्य जैविक ईंधन सुरक्षित रखे जाते थे। रसोई के उपकरण भी उसी व्यवस्था के अनुरूप होते थे। चिमटा, फूंकनी, मिट्टी की अंगीठी, लोहे का तवा और अन्य पारंपरिक साधन हर घर में उपलब्ध रहते थे।

लेकिन आधुनिकता की दौड़ में लोगों ने इन संसाधनों को अनुपयोगी मान लिया। गैस चूल्हे के कारण रसोई के स्वरूप में बदलाव आया। सुविधा बढ़ी, समय बचा और महिलाएं धुएं से मुक्त हुईं। यह बदलाव सकारात्मक था, लेकिन इसकी एक शर्त थी—गैस की निरंतर उपलब्धता और वह भी गरीब परिवार की पहुंच के भीतर।

आज समस्या तब पैदा हुई जब गैस पर निर्भरता तो बढ़ गई लेकिन उसकी लागत भी लगातार बढ़ती चली गई। परिणामस्वरूप गरीब परिवार बीच रास्ते में खड़े दिखाई दे रहे हैं। न तो वे पूरी तरह गैस का उपयोग कर पा रहे हैं और न ही पुराने संसाधनों को पहले जैसी स्थिति में वापस ला पा रहे हैं।

यहां सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न सरकार और नीति निर्माताओं के सामने खड़ा होता है कि क्या केवल कनेक्शन बांटना ही किसी योजना की सफलता का पैमाना है? यदि लाभार्थी नियमित रूप से उस सुविधा का उपयोग नहीं कर पा रहा, तो योजना के मूल उद्देश्य पर पुनर्विचार आवश्यक है।

आज गांवों में विवाह, सामाजिक समारोह और घरेलू कार्यक्रम भी गैस सिलेंडरों पर निर्भर हो गए हैं। पहले बड़े-बड़े भट्टों और अंगीठियों पर भोजन तैयार होता था। स्थानीय संसाधनों का उपयोग होता था। अब गैस के बिना कार्यक्रम आयोजित करना कठिन माना जाने लगा है। यह निर्भरता तब संकट बन जाती है जब सिलेंडर की कीमत आम आदमी की आय से मेल नहीं खाती।

इसके साथ ही एक सामाजिक और पर्यावरणीय पहलू भी जुड़ा हुआ है। यदि लोग पुनः लकड़ी और पारंपरिक ईंधन की ओर लौटते हैं, तो वनों पर दबाव बढ़ सकता है तथा महिलाओं को फिर धुएं और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए समाधान केवल पुराने चूल्हों की वापसी नहीं हो सकता।

समाधान यह है कि सरकार उज्ज्वला योजना के दूसरे चरण पर गंभीरता से विचार करे। गरीब परिवारों के लिए रिफिल पर स्थायी और प्रभावी सब्सिडी सुनिश्चित की जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस, सौर ऊर्जा आधारित रसोई और अन्य वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही ग्रामीण आय बढ़ाने वाली नीतियों को भी प्राथमिकता दी जाए ताकि परिवार अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति सम्मानपूर्वक कर सकें।

उज्ज्वला योजना का उद्देश्य केवल गैस कनेक्शन देना नहीं था, बल्कि महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाकर उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाना था। यदि आज वही महिलाएं मजबूरी में पुराने चूल्हों की ओर लौट रही हैं, तो यह केवल आर्थिक संकट नहीं बल्कि नीति के क्रियान्वयन की चुनौती भी है।

किसी भी योजना का मूल्यांकन उसके उद्घाटन समारोह से नहीं, बल्कि वर्षों बाद लाभार्थी के जीवन में दिखाई देने वाले प्रभाव से होता है। यदि गरीब परिवार गैस सिलेंडर को भरवाने में असमर्थ हैं, तो यह संकेत है कि हमें आंकड़ों से आगे बढ़कर जमीनी वास्तविकताओं को समझना होगा। विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब सुविधा केवल घर तक पहुंचे नहीं, बल्कि लगातार उपयोग में भी बनी रहे। अन्यथा उज्ज्वला की लौ धीरे-धीरे मंद पड़ती जाएगी और गांव की रसोई फिर उसी धुएं और मजबूरी के अंधेरे में लौट जाएगी, जिससे उसे बाहर निकालने का सपना कभी दिखाया गया था।

*भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

"जीवन में सबसे बड़ी पूंजी धन नहीं, बल्कि विश्वास है। धन खोकर फिर कमाया जा सकता है, लेकिन विश्वास खो जाने पर रिश्ते, सम्मान और अवसर—तीनों हाथ से निकल जाते हैं। इसलिए कमाई से पहले अपनी विश्वसनीयता कमाइए, क्योंकि वही आपकी असली पहचान है।"

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