भाषणों में विश्वगुरु, जमीन पर आर्थिक मजबूरी : क्या हमारी विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन सवालों के घेरे में हैं?”

 संपादकीय @हरेश पंवार 30-05-2026

*“भाषणों में विश्वगुरु, जमीन पर आर्थिक मजबूरी : क्या हमारी विदेश नीति और आर्थिक प्रबंधन सवालों के घेरे में हैं?”*
भारत आज वैश्विक मंचों पर स्वयं को एक उभरती हुई महाशक्ति और “विश्वगुरु” के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत की विदेश नीति की सफलता के दावे किए जाते हैं, लेकिन दूसरी ओर जब यूक्रेन-रूस युद्ध जैसे क्षेत्रीय संघर्ष का असर भारत की आम जनता की रसोई, जेब और जीवनशैली पर सीधा दिखाई देने लगे, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारी आर्थिक और विदेश नीति वास्तव में उतनी मजबूत है, जितना उसका प्रचार किया जाता है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अस्थिरता, रसोई गैस के बढ़ते दाम, खाद्य पदार्थों की महंगाई और डॉलर के मुकाबले रुपये की लगातार कमजोर होती स्थिति ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि सरकार स्वयं जनता से अपील कर रही है कि लोग सोना कम खरीदें, विदेश यात्राएं टालें, ईंधन की खपत घटाएं और पारंपरिक चूल्हों का उपयोग करें। यह संदेश कहीं न कहीं इस बात की ओर संकेत करता है कि आर्थिक दबाव सरकार के स्तर पर गंभीर रूप से महसूस किया जा रहा है।

यह सवाल भी जनता के मन में उठता है कि यदि देश की विदेश नीति इतनी प्रभावशाली है, तो भारत की मुद्रा लगातार कमजोर क्यों हो रही है? डॉलर के मुकाबले रुपये का गिरना केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की आर्थिक क्षमता और वैश्विक विश्वास का दर्पण भी होता है। जब भारत से छोटे और कमजोर देशों की मुद्राएं भी अपेक्षाकृत स्थिर दिखाई देती हैं, तब आम नागरिक का चिंतित होना स्वाभाविक है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक और विडंबना सामने आती है। चुनावों के दौरान महंगाई नियंत्रित दिखाई देती है, पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहते हैं और जनता को राहत का वातावरण महसूस कराया जाता है। लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त होते हैं, आर्थिक संकट और महंगाई की चर्चा तेज हो जाती है। इससे आमजन के मन में यह धारणा बनने लगती है कि आर्थिक नीतियों का संचालन दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की बजाय राजनीतिक सुविधाओं के आधार पर हो रहा है।

कोरोना काल का उदाहरण भी जनता के मन में कई सवाल छोड़ गया। जब देश महामारी और लॉकडाउन जैसी त्रासदी से गुजर रहा था, उससे पहले बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों और राजनीतिक कार्यक्रमों पर भारी खर्च किए गए। “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों में करोड़ों रुपये खर्च हुए। आज जब आर्थिक संकट की बात हो रही है, तब जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि क्या उस समय राष्ट्रीय संसाधनों का उपयोग अधिक विवेकपूर्ण ढंग से नहीं किया जा सकता था?

विदेश यात्राओं और अंतरराष्ट्रीय छवि निर्माण की राजनीति भी अब जनता की आलोचना के घेरे में है। जनता यह देख रही है कि जब देश में बेरोजगारी, महंगाई, पंचायत चुनावों में देरी, ग्रामीण अव्यवस्था और स्थानीय प्रशासनिक संकट गहराते जा रहे हैं, तब सत्ता का बड़ा हिस्सा प्रचार और विदेश यात्राओं में अधिक व्यस्त दिखाई देता है। लोकतंत्र केवल भाषणों और नारों से नहीं चलता, बल्कि जमीनी व्यवस्था की मजबूती से चलता है।

ग्रामीण भारत की स्थिति इस समय सबसे अधिक चिंताजनक दिखाई देती है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पंचायत चुनाव समय पर नहीं हो पाने से गांवों की लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित हुई है। चुनी हुई ग्राम सरकारों के अभाव में प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही कम हुई है और नौकरशाही का प्रभाव बढ़ा है। गांवों की गलियों में गंदगी, पानी की समस्या, विकास कार्यों की धीमी गति और आमजन की परेशानियां यह संकेत देती हैं कि लोकतंत्र की असली ताकत—स्थानीय स्वशासन—कमजोर हो रहा है।

भारत की ताकत केवल बड़े शहरों, विदेशी निवेश या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तालियों से नहीं मापी जा सकती। असली ताकत तब दिखाई देगी, जब गांव का किसान, मजदूर, बेरोजगार युवा और मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करेगा। जब जनता को अपनी जरूरतों के लिए बार-बार त्याग और संयम का संदेश दिया जाए, तब सरकारों को भी अपने खर्च, प्राथमिकताओं और नीतियों का आत्ममंथन करना चाहिए।

यह समय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर गंभीर चिंतन का है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मजबूत विदेश नीति का अर्थ केवल विश्व मंच पर प्रभावशाली भाषण देना नहीं, बल्कि देश की जनता को आर्थिक स्थिरता, मजबूत मुद्रा, सस्ती ऊर्जा और भरोसेमंद जीवन देना भी है। यदि आम नागरिक लगातार महंगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक अव्यवस्था से जूझ रहा है, तो केवल “विश्वगुरु” के नारे उसकी पीड़ा को कम नहीं कर सकते।

देश को आज ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर वास्तविक आर्थिक आत्मनिर्भरता, मजबूत लोकतांत्रिक ढांचे और जनकल्याण पर आधारित हों। क्योंकि अंततः किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता होती है—और जब जनता ही परेशान हो, तो विकास के बड़े-बड़े दावे खोखले प्रतीत होने लगते हैं।

: *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

“जिस समाज में दिखावे की आवाज़ सच से ऊँची हो जाती है, वहाँ इंसान धीरे-धीरे रिश्तों से नहीं, बल्कि अपने ही विवेक से दूर होने लगता है।”

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