पत्रकारिता का विकृत रूप और लोकतंत्र पर प्रभाव

संपादकीय@ हरेश पंवार#02-06-2026

*पत्रकारिता का विकृत रूप और लोकतंत्र पर प्रभाव*
लोकतंत्र को अक्सर चार स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—पर आधारित माना जाता है। इनमें मीडिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण इसलिए मानी जाती है क्योंकि वह जनता और सत्ता के बीच संवाद का सेतु होती है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से प्रश्न पूछना, जनहित के मुद्दों को उठाना और निष्पक्ष सूचना उपलब्ध कराना है। लेकिन जब पत्रकारिता का केंद्र जनहित के बजाय टीआरपी, राजनीतिक पक्षधरता या व्यक्तिगत पूर्वाग्रह बन जाता है, तब लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

हिंदी पत्रकारिता दिवस हमें उन मूल्यों की याद दिलाता है, जिनके लिए पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी। भारतीय पत्रकारिता का इतिहास जनजागरण, सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा है। लेकिन वर्तमान समय में मीडिया के एक वर्ग पर यह आरोप लगातार लग रहा है कि वह निष्पक्षता से दूर होता जा रहा है। बहसों में शालीनता की जगह शोर, तथ्यों की जगह आरोप और संवाद की जगह टकराव देखने को मिलता है।

यदि किसी पत्रकार या एंकर द्वारा किसी वर्ग, समुदाय या पेशे के प्रति अपमानजनक टिप्पणी की जाती है, तो उसका प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे मीडिया जगत की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। शिक्षक, किसान, मजदूर, सैनिक, चिकित्सक या किसी भी पेशे से जुड़े लोगों का सम्मान लोकतांत्रिक संस्कृति का हिस्सा है। आलोचना और प्रश्न पूछना पत्रकारिता का अधिकार है, लेकिन भाषा और मर्यादा का पालन करना उसका दायित्व भी है।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार चर्चा होती रही है। विभिन्न वैश्विक सूचकांकों में देशों की रैंकिंग प्रेस की स्वतंत्रता, पत्रकारों की सुरक्षा और सूचना तक पहुंच के आधार पर की जाती है। ऐसे सूचकांक यह संकेत देते हैं कि किसी देश में मीडिया कितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा के साथ कार्य कर पा रही है। हालांकि इन रैंकिंगों पर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन यह निश्चित है कि मीडिया की स्वतंत्रता और उसकी विश्वसनीयता किसी भी लोकतंत्र की सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक होती है।

आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मीडिया स्वयं भी जनता के विश्वास के संकट का सामना कर रहा है। जब दर्शकों को यह महसूस होने लगता है कि समाचारों की प्रस्तुति निष्पक्ष नहीं है या पत्रकारिता किसी विचारधारा, दल या कॉरपोरेट हितों से प्रभावित है, तब मीडिया पर भरोसा कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र में यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि जागरूक नागरिकों के लिए विश्वसनीय सूचना का स्रोत कमजोर पड़ जाता है।

वर्तमान समय में पत्रकारिता को आत्ममंथन की आवश्यकता है। मीडिया को यह याद रखना होगा कि उसका वास्तविक दायित्व सत्ता की प्रशंसा करना या विपक्ष की आलोचना करना नहीं, बल्कि जनता के हितों की रक्षा करना है। पत्रकारिता का सम्मान तभी बना रहेगा जब उसमें तथ्य, निष्पक्षता, संवेदनशीलता और जवाबदेही का संतुलन कायम रहेगा।

लोकतंत्र की मजबूती के लिए स्वतंत्र और जिम्मेदार पत्रकारिता अनिवार्य है। यदि पत्रकारिता अपने मूल आदर्शों—सत्य, निष्पक्षता और जनहित—से भटकती है, तो उसका नुकसान केवल मीडिया संस्थानों को नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे को उठाना पड़ता है। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक उसकी नैतिक जिम्मेदारी भी है। एक स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहाँ मीडिया सत्ता से सवाल पूछे, लेकिन समाज के प्रति अपनी मर्यादा और उत्तरदायित्व भी निभाए।

*भीम प्रज्ञाअलर्ट* 

"जीवन में सफलता केवल ऊँचाइयाँ छूने से नहीं मिलती, बल्कि उन मूल्यों को बचाए रखने से मिलती है जो आपको ऊँचाइयों तक पहुँचाते हैं। चरित्र खोकर मिली जीत क्षणिक होती है, लेकिन सिद्धांतों के साथ मिली हार भी अंततः सम्मान दिलाती है।"

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