*हुनर नहीं, घमंड डुबोता है इंसान को*

[6/3, 01:03] Adv. Haresh Panwar@ संपादकीय 

*हुनर नहीं, घमंड डुबोता है इंसान को*
मानव जीवन में ज्ञान, कला, प्रतिभा और हुनर का विशेष महत्व है। यही गुण व्यक्ति को भीड़ से अलग पहचान दिलाते हैं और उसे सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं। कोई व्यक्ति अपनी विद्वता से सम्मान अर्जित करता है, कोई अपनी कला से लोगों के दिलों में जगह बनाता है, तो कोई अपने कौशल और परिश्रम के बल पर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों इस बात के गवाह हैं कि इंसान को उसकी प्रतिभा कभी नहीं डुबोती, बल्कि उस प्रतिभा से उत्पन्न होने वाला अहंकार उसे पतन की ओर ले जाता है। जहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

अक्सर देखा जाता है कि जब व्यक्ति किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर लेता है, तो उसके भीतर यह भावना जन्म लेने लगती है कि उससे बेहतर कोई नहीं है। यही भावना धीरे-धीरे आत्मविश्वास से आगे बढ़कर अहंकार का रूप धारण कर लेती है। व्यक्ति अपनी उपलब्धियों को अपनी मेहनत का परिणाम मानने के बजाय स्वयं को सर्वश्रेष्ठ और दूसरों को कमतर समझने लगता है। यहीं से उसके पतन की शुरुआत हो जाती है।

प्रकृति हमें हर पल विनम्रता का पाठ पढ़ाती है। फल से लदा हुआ वृक्ष हमेशा झुका रहता है, जबकि सूखा और बंजर वृक्ष अकड़कर खड़ा रहता है। नदी का जल भी नीचे की ओर बहकर ही लोगों की प्यास बुझाता है। बादल भी तभी बरसते हैं जब वे झुकते हैं। प्रकृति का यह संदेश स्पष्ट है कि जितना बड़ा बनो, उतना ही विनम्र बनो। जो झुकना जानता है, वही समाज का सम्मान प्राप्त करता है।

वर्तमान समय में सामाजिक जीवन से लेकर राजनीति, शिक्षा, प्रशासन, व्यापार और मीडिया तक हर क्षेत्र में प्रतिभाशाली लोग मौजूद हैं। लेकिन सम्मान हमेशा उन्हीं लोगों को मिलता है जो अपनी काबिलियत के साथ विनम्रता को भी बनाए रखते हैं। इसके विपरीत, जो लोग अपने ज्ञान या पद के कारण दूसरों को तुच्छ समझने लगते हैं, वे धीरे-धीरे समाज से कट जाते हैं। लोग उनकी प्रतिभा का सम्मान भले करें, लेकिन उनके व्यक्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते।

यह भी एक महत्वपूर्ण सत्य है कि सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती। जिस दिन व्यक्ति यह मान लेता है कि उसे सब कुछ आ गया है, उसी दिन उसका विकास रुक जाता है। दुनिया में कोई भी इतना बड़ा नहीं हुआ कि उसे कुछ नया सीखने की आवश्यकता न हो। विज्ञान, तकनीक, समाज और विचार निरंतर बदल रहे हैं। ऐसे में जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण समझ लेता है, वह समय के साथ पिछड़ जाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति हर दिन स्वयं को विद्यार्थी मानता है, वह निरंतर आगे बढ़ता रहता है।

आज के डिजिटल युग में यह समस्या और भी बढ़ गई है। सोशल मीडिया ने लोगों को अपनी उपलब्धियों को प्रदर्शित करने का आसान मंच दिया है। प्रसिद्धि और प्रशंसा की चाह में कई बार लोग अपनी वास्तविक क्षमता से अधिक स्वयं को प्रस्तुत करने लगते हैं। लाइक, फॉलोअर और प्रशंसा के बीच व्यक्ति यह भूल जाता है कि वास्तविक मूल्यांकन समाज और समय करते हैं, स्वयं की घोषणा से महानता सिद्ध नहीं होती। इतिहास में वही लोग अमर हुए हैं जिन्होंने अपने ज्ञान को सेवा का माध्यम बनाया, न कि अहंकार का हथियार।

समाज में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ साधारण पृष्ठभूमि से आए लोगों ने बड़ी सफलताएँ प्राप्त कीं, लेकिन उनकी विनम्रता ने उन्हें और भी महान बना दिया। वहीं अनेक ऐसे लोग भी हुए जिनकी प्रतिभा असाधारण थी, परंतु अहंकार ने उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल कर दिया। इसलिए सफलता का वास्तविक अर्थ केवल ऊंचे पद या प्रसिद्धि प्राप्त करना नहीं, बल्कि उस ऊंचाई पर पहुंचकर भी अपने संस्कारों और विनम्रता को सुरक्षित रखना है।

यह सत्य जीवन के हर क्षेत्र पर लागू होता है। परिवार में भी यदि कोई व्यक्ति अपनी कमाई, शिक्षा या पद का अहंकार करने लगे, तो रिश्तों में दूरी आने लगती है। कार्यस्थल पर अहंकार सहयोग की भावना को समाप्त कर देता है। समाज में अहंकार संवाद के द्वार बंद कर देता है। इसलिए व्यक्ति को हमेशा यह याद रखना चाहिए कि सम्मान मांगने से नहीं, बल्कि व्यवहार से प्राप्त होता है।
हुनर ईश्वर या प्रकृति का दिया हुआ एक वरदान है। इसका उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना, दूसरों का मार्गदर्शन करना और स्वयं को निरंतर विकसित करना है। यदि यह हुनर विनम्रता के साथ जुड़ा रहे तो व्यक्ति को महान बना देता है, लेकिन यदि इसके साथ अहंकार जुड़ जाए तो यही हुनर उसके पतन का कारण बन सकता है।

अंततः जीवन का सार यही है कि अपनी प्रतिभा पर विश्वास रखें, लेकिन उसे घमंड में परिवर्तित न होने दें। तैराक की तरह परिस्थितियों के साथ लचीले बनें, वृक्ष की तरह फल आने पर झुकें और विद्यार्थी की तरह सीखते रहें। क्योंकि इतिहास यह बताता है कि इंसान को उसका हुनर नहीं डुबोता, बल्कि उस हुनर का अहंकार डुबोता है। विनम्रता ही वह नाव है जो प्रतिभा को सफलता के महासागर में सुरक्षित किनारे तक पहुंचाती है।

 *भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

"ज्ञान, पद और संपत्ति से बड़ा कोई आभूषण नहीं, लेकिन विनम्रता के बिना ये सभी बोझ बन जाते हैं। जो व्यक्ति जितना ऊँचा उठता है, उसे उतना ही झुकना सीखना चाहिए, क्योंकि फलदार वृक्ष और महान व्यक्तित्व दोनों अपनी विनम्रता से पहचाने जाते हैं।"

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