धरती का भगवान या स्वास्थ्य का बाजार?

[6/12, 05:50] Adv. Haresh Panwar: संपादकीय 

*धरती का भगवान या स्वास्थ्य का बाजार?*
भारत में डॉक्टरों को सदियों से “धरती का भगवान” कहा जाता रहा है। यह उपाधि उन्हें केवल उनके ज्ञान या पेशे के कारण नहीं मिली, बल्कि इसलिए मिली क्योंकि एक मरीज अपने जीवन की सबसे कठिन घड़ी में अपना शरीर, अपना विश्वास और कई बार अपनी आखिरी उम्मीद भी डॉक्टर के हाथों में सौंप देता है। जब कोई व्यक्ति बीमारी, दुर्घटना या मृत्यु के भय से जूझ रहा होता है, तब डॉक्टर उसके लिए केवल एक चिकित्सक नहीं, बल्कि जीवनदाता बन जाता है। लेकिन आज समाज के एक बड़े वर्ग में यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या चिकित्सा सेवा अब भी सेवा है या धीरे-धीरे एक महंगे व्यवसाय में बदलती जा रही है? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

हाल के वर्षों में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी कई घटनाओं ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। कहीं इलाज में लापरवाही के आरोप लगते हैं, कहीं अनावश्यक जांचों और महंगी दवाइयों का बोझ मरीजों पर डाला जाता है, तो कहीं कुछ डॉक्टरों द्वारा किए गए गंभीर आपराधिक कृत्य पूरे चिकित्सा जगत की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। हरियाणा जैसी घटनाओं में जब मासूम बच्चों के साथ अपराध के आरोप सामने आते हैं, तो लोगों का आक्रोश स्वाभाविक है। ऐसी घटनाएं केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि उस विश्वास की हत्या भी हैं, जिस पर डॉक्टर और मरीज का रिश्ता टिका होता है।

ग्रामीण भारत की स्थिति और भी अधिक चिंताजनक है। गांव का गरीब किसान, मजदूर या आम आदमी जब बीमार पड़ता है, तो वह अपनी जमा-पूंजी, गहने और कई बार जमीन तक गिरवी रखकर इलाज करवाने के लिए शहरों के बड़े अस्पतालों की ओर दौड़ता है। अस्पताल के बाहर लंबी कतारें, परामर्श शुल्क, जांचों का खर्च, दवाइयों की कीमत और बार-बार आने-जाने का खर्च मिलाकर बीमारी से अधिक आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है। मरीज इलाज से पहले ही मानसिक रूप से टूटने लगता है।

आज चिकित्सा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा महंगी जांचों और ब्रांडेड दवाइयों पर आधारित दिखाई देता है। मरीज को अक्सर लंबी जांच सूची थमा दी जाती है। कई बार उसे यह समझ ही नहीं आता कि इनमें से कौन-सी जांच वास्तव में आवश्यक है और कौन-सी नहीं। दवाइयों के मामले में भी स्थिति चिंताजनक है। एक डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा कई बार दूसरे मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध नहीं होती। मरीज को उसी स्थान से दवा खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है, जहां से संबंधित व्यवस्था जुड़ी होती है। इससे आमजन के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।

इस स्थिति के पीछे एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि चिकित्सा शिक्षा आज अत्यंत महंगी हो चुकी है। लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा डॉक्टर जब अस्पताल स्थापित करते हैं, तो उन पर बैंक ऋण, आधुनिक उपकरणों और भवन निर्माण की भारी लागत का दबाव होता है। परिणामस्वरूप कुछ लोग चिकित्सा सेवा को सेवा के बजाय निवेश की वसूली का माध्यम बना लेते हैं। यही वह मोड़ है जहां चिकित्सा और व्यापार की रेखा धुंधली होने लगती है।

दूसरी ओर, समाज का एक बड़ा वर्ग स्वास्थ्य संबंधी मामलों में भी पूरी तरह डॉक्टरों पर निर्भर हो चुका है। परंपरागत जीवनशैली, संतुलित खान-पान और प्राकृतिक स्वास्थ्य आदतों से दूरी बढ़ी है। छोटी-छोटी समस्याओं के लिए भी दवाइयों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। इससे मरीज और डॉक्टर दोनों एक ऐसे चक्र में फंस जाते हैं, जहां बीमारी भी बढ़ती है और चिकित्सा खर्च भी।

हालांकि यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि पूरे डॉक्टर समुदाय को एक ही तराजू में तौलना अन्याय होगा। देश में हजारों ऐसे चिकित्सक हैं जो सीमित संसाधनों के बीच दिन-रात मानव सेवा में लगे हुए हैं। कोरोना महामारी के दौरान अनेक डॉक्टरों ने अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों का उपचार किया। कई डॉक्टर आज भी गरीब मरीजों का निःस्वार्थ इलाज करते हैं। इसलिए कुछ लोगों की गलतियों के आधार पर पूरे पेशे को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं होगा।

समस्या का समाधान डॉक्टरों और जनता के बीच अविश्वास बढ़ाने में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने में है। चिकित्सा शिक्षा को सस्ता और सुलभ बनाना, सरकारी अस्पतालों को मजबूत करना, अनावश्यक जांचों और दवाइयों पर निगरानी बढ़ाना तथा चिकित्सा नैतिकता का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना समय की मांग है। साथ ही, मरीजों को भी स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ानी होगी और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाना होगा।

अंततः, डॉक्टर का पेशा केवल रोजगार नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का सबसे पवित्र माध्यम है। समाज आज भी डॉक्टरों को सम्मान और विश्वास की दृष्टि से देखना चाहता है। लेकिन यह सम्मान तभी कायम रहेगा, जब चिकित्सा सेवा का केंद्र मरीज का हित होगा, न कि केवल मुनाफा। "धरती का भगवान" कहलाने का गौरव केवल डिग्री से नहीं, बल्कि संवेदना, ईमानदारी और मानवता से प्राप्त होता है। जिस दिन चिकित्सा व्यवस्था में यह भावना सर्वोपरि होगी, उसी दिन मरीजों का डगमगाता विश्वास फिर से मजबूत हो सकेगा।

क्योंकि चिकित्सा का वास्तविक धर्म धन कमाना नहीं, बल्कि जीवन बचाना है।

*भीम प्रज्ञा अलर्ट* 

"वृक्ष अपनी ऊँचाई से नहीं, बल्कि अपने फलों से पहचाना जाता है; उसी प्रकार मनुष्य अपने पद से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और कर्मों से सम्मान पाता है।"

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