लुप्त होती जल संस्कृति और केवट-कीर समुदाय : आखिर कहाँ खो गई जल सभ्यता की वह विरासत?
[6/14, 12:23] Adv. Haresh Panwar: संपादकीय
*लुप्त होती जल संस्कृति और केवट-कीर समुदाय : आखिर कहाँ खो गई जल सभ्यता की वह विरासत?*
भारत की सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई है। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र और अनगिनत नदियों ने केवल मानव जीवन को जल ही नहीं दिया, बल्कि अनेक समुदायों को आजीविका, पहचान और संस्कृति भी प्रदान की। इन्हीं जल सभ्यताओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण समुदाय है—कीर या केवट समाज। यह समुदाय सदियों से जलाशयों, नदियों, तालाबों, सरोवरों और दलदली क्षेत्रों के साथ अपना जीवन जोड़कर भारतीय समाज की सेवा करता रहा है। लेकिन बदलते समय, सिकुड़ते जल स्रोतों और आधुनिक जीवनशैली के कारण आज इस समुदाय का पारंपरिक व्यवसाय और सांस्कृतिक अस्तित्व गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भारतीय जनमानस में केवट का नाम आते ही रामायण का वह प्रसंग स्मरण हो उठता है, जब वनवास के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण को नदी पार कराने का सौभाग्य केवट को प्राप्त हुआ था। यह प्रसंग केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण भी है कि केवट समुदाय का जीवन नदियों और नौकायन से कितना गहराई से जुड़ा हुआ था। केवट केवल नाविक नहीं था, वह जलमार्गों का संरक्षक, नदी संस्कृति का वाहक और मानव सभ्यता को जोड़ने वाला सेतु था।
कीर-केवट समुदाय का पारंपरिक जीवन जल स्रोतों के इर्द-गिर्द विकसित हुआ। ये लोग तालाबों, झीलों और दलदली भूमि में सिंघाड़ा, कमल ककड़ी, जल सब्जियाँ तथा अन्य जल उत्पादों की खेती करते थे। जलकुंभी और जल वनस्पतियों के प्रबंधन में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सिंघाड़ा और अन्य जल उत्पादों को गांव-गांव तक पहुँचाने का कार्य भी यही समुदाय करता था।
इसके साथ-साथ यह समुदाय प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित हस्तशिल्प कला में भी निपुण था। नदियों और तालाबों के किनारे उगने वाली झाड़ियों, बांस, सरकंडों और पेड़-पौधों की टहनियों से टोकरी, छाबड़ी, खरली, बांस की टोकरियां, रोटी रखने की चंगेरी और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुएं तैयार करना इनकी विशेष पहचान थी। आज प्लास्टिक और फैक्ट्री निर्मित सामान ने इन पारंपरिक उत्पादों का स्थान ले लिया है, लेकिन कभी यही वस्तुएँ ग्रामीण जीवन की आवश्यक जरूरत थीं।
केवट समाज की सबसे बड़ी विशेषता उसका जल कौशल था। इस समुदाय के लोग उत्कृष्ट तैराक, गोताखोर और जलजीवन के जानकार माने जाते थे। बाढ़, डूबने की घटनाओं और नदी पार कराने जैसे कार्यों में उनकी विशेषज्ञता का कोई मुकाबला नहीं था। अनेक क्षेत्रों में आज भी जल बचाव अभियानों में इस समुदाय के लोगों की सेवाएँ ली जाती हैं। यह कौशल पीढ़ियों से हस्तांतरित होता रहा है और अपने आप में एक अमूल्य लोकज्ञान है।
दुर्भाग्यवश आधुनिक विकास मॉडल ने जल संस्कृति को सबसे अधिक प्रभावित किया है। तालाबों का अतिक्रमण, नदियों का प्रदूषण, जल स्रोतों का सूखना और पारंपरिक जलमार्गों का समाप्त होना सीधे तौर पर केवट-कीर समुदाय की आजीविका पर चोट बनकर आया। जहाँ कभी सिंघाड़े की खेती होती थी, वहाँ आज सूखी जमीन या कंक्रीट के ढाँचे दिखाई देते हैं। जिन जलाशयों से समुदाय का जीवन चलता था, वे या तो सिकुड़ गए या पूरी तरह समाप्त हो गए।
इसके परिणामस्वरूप समुदाय के युवा अपने पुश्तैनी व्यवसायों से दूर होते चले गए। आज अनेक परिवार मजदूरी, छोटे व्यापार या अन्य व्यवसायों में लगे हुए हैं। यह परिवर्तन आर्थिक दृष्टि से आवश्यक हो सकता है, लेकिन इसके साथ-साथ एक पूरी सांस्कृतिक विरासत भी धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है।
सामाजिक दृष्टि से भी इस समुदाय का योगदान कम नहीं रहा है। जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग और पर्यावरणीय समझ इस समुदाय के जीवन का हिस्सा रही है। आज जब पूरा विश्व जल संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहा है, तब केवट-कीर समुदाय के पारंपरिक ज्ञान और अनुभवों का अध्ययन करना समय की आवश्यकता बन गया है।
संतोष की बात यह है कि आज समाज के कुछ जागरूक लोग इस विरासत को बचाने का प्रयास कर रहे हैं। राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों में कीर-केवट समाज के संगठन सामाजिक चेतना, शिक्षा, संगठन और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। समाज के शिक्षित वर्ग द्वारा इतिहास, संस्कृति और सामाजिक पहचान को पुनर्जीवित करने के प्रयास भविष्य के लिए आशा की किरण हैं। समाजसेवी और संगठनात्मक कार्यकर्ता नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
आज आवश्यकता केवल अतीत को याद करने की नहीं, बल्कि उसे संरक्षित करने की है। सरकारों को चाहिए कि जल संस्कृति से जुड़े समुदायों के इतिहास, लोकज्ञान और पारंपरिक कौशल का दस्तावेजीकरण कराया जाए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में इन समुदायों के योगदान पर शोध कार्य हों। जल संरक्षण अभियानों में इनके अनुभवों को शामिल किया जाए तथा हस्तशिल्प और पारंपरिक व्यवसायों को प्रोत्साहन दिया जाए।
केवट-कीर समुदाय की कहानी केवल एक जाति की कहानी नहीं है। यह भारत की जल सभ्यता, श्रम संस्कृति और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन की कहानी है। यदि हम इन समुदायों की विरासत को बचाने में सफल नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल रामायण के केवट को तो जानेंगी, लेकिन उस जीवंत समाज को नहीं जान पाएँगी जिसने सदियों तक नदियों, तालाबों और जल संस्कृति को जीवित रखा।
वास्तव में किसी समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों और श्रमशील समुदायों से होती है। केवट-कीर समाज की विरासत का संरक्षण केवल उस समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज का दायित्व है। क्योंकि जब कोई संस्कृति विलुप्त होती है, तो उसके साथ इतिहास का एक पूरा अध्याय भी हमेशा के लिए खो जाता है।
*भीम प्रज्ञा अलर्ट*
"हर परंपरा के पीछे सदियों का अनुभव छिपा होता है। आधुनिकता को अपनाइए, लेकिन अपनी संस्कृति और लोक ज्ञान को कभी बोझ मत समझिए।"
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