लुप्त होती कारीगरी, गुम होता ग्रामीण रोजगार : आखिर कहां खो गया ‘गुंवारिया’ का संसार?

[6/14, 16:33] Adv. Haresh Panwar: संपादकीय 

*लुप्त होती कारीगरी, गुम होता ग्रामीण रोजगार : आखिर कहां खो गया ‘गुंवारिया’ का संसार?*
भारत गांवों का देश है। यहां की संस्कृति केवल मंदिरों, मेलों और त्योहारों में ही नहीं बसती, बल्कि उन पारंपरिक व्यवसायों और कारीगरों में भी जीवित रहती है जिन्होंने सदियों तक ग्रामीण जीवन को आत्मनिर्भर बनाया। दुर्भाग्य से आधुनिकता, मशीनों और बदलती जीवनशैली के दौर में अनेक पारंपरिक व्यवसाय इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं। इन्हीं में से एक है ‘गुंवारिया’ का व्यवसाय, जो कभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

आज यदि किसी बातचीत में ‘गुंवारिया’ शब्द का प्रयोग हो जाए तो अधिकांश लोग इसे उपहास या व्यंग्य के रूप में समझते हैं। नई पीढ़ी तो शायद यह भी नहीं जानती कि गुंवारिया कौन था और उसका समाज में क्या योगदान था। वास्तव में गुंवारिया कोई गाली नहीं, बल्कि एक मेहनतकश कारीगर समुदाय का नाम था, जिसका काम पत्थर की हाथ चक्कियों को बनाना, घड़़ना और ‘रुहाना’ अर्थात उनकी मरम्मत करना था।

एक समय था जब लगभग हर ग्रामीण घर में पत्थर की हाथ चक्की हुआ करती थी। गेहूं, जौ, बाजरा, मक्का और अन्य अनाजों की पिसाई इन्हीं चक्कियों पर होती थी। घर की महिलाएं सुबह-सुबह चक्की चलाकर दिनभर के भोजन की तैयारी करती थीं। उस दौर में चक्की केवल आटा पीसने का साधन नहीं थी, बल्कि वह ग्रामीण जीवन की धड़कन थी। उसकी घर्र-घर्र की आवाज गांव की सुबह का संगीत हुआ करती थी।

गुंवारिया इसी व्यवस्था का महत्वपूर्ण पात्र था। वह गांव-गांव घूमकर चक्कियों की मरम्मत करता, पत्थरों को फिर से खुरदरा बनाता और उन्हें उपयोग योग्य बनाता था। उसके हाथ में हथौड़ी और टांकी होती थी, जिनकी तालबद्ध चोटों से पत्थर पर नई जान आ जाती थी। उसकी टक-टक की आवाज केवल काम की ध्वनि नहीं, बल्कि ग्रामीण संस्कृति की पहचान थी।

उस समय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकद लेन-देन कम और वस्तु विनिमय अधिक होता था। गुंवारिया अपनी सेवा के बदले गेहूं, बाजरा, दाल या अन्य खाद्यान्न प्राप्त करता था। यही उसकी आय थी और इसी से उसके परिवार का जीवन चलता था। वह कई दिनों तक गांव में रुकता, धर्मशालाओं या चौपालों में ठहरता और ग्रामीणों के साथ घुल-मिल जाता था। शाम को अलाव के आसपास बैठकर लोककथाएं, किस्से और अनुभव सुनाना भी उसके जीवन का हिस्सा था। वह केवल कारीगर नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का संवाहक भी था।

लेकिन समय बदला। बिजली से चलने वाली आटा चक्कियों और फ्लोर मिलों का विस्तार हुआ। फिर पैकेट बंद आटा बाजार में आने लगा। धीरे-धीरे हाथ चक्कियां घरों से गायब होने लगीं और उनके साथ गुंवारिया का व्यवसाय भी समाप्ति की ओर बढ़ गया। आज शायद ही कोई गांव ऐसा हो जहां गुंवारिया अपनी पारंपरिक पहचान के साथ दिखाई देता हो।

यह परिवर्तन केवल एक व्यवसाय के खत्म होने की कहानी नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत के क्षरण की कहानी भी है। मशीनों ने सुविधा तो दी, लेकिन उन्होंने उन हजारों पारंपरिक रोजगारों को भी निगल लिया जो गांवों की आत्मा थे।

हाथ चक्की का एक स्वास्थ्य संबंधी पक्ष भी था, जिसे आज आधुनिक विज्ञान भी स्वीकार करने लगा है। चक्की चलाना अपने आप में एक संपूर्ण शारीरिक व्यायाम था। महिलाओं के हाथ, कंधे, कमर और शरीर की मांसपेशियां नियमित रूप से सक्रिय रहती थीं। यही कारण था कि पहले की ग्रामीण महिलाएं शारीरिक रूप से अधिक मजबूत और श्रमशील होती थीं। आज डॉक्टर गर्भवती महिलाओं को हल्का व्यायाम और शारीरिक सक्रियता की सलाह देते हैं, जबकि हमारे पूर्वजों की जीवनशैली में यह सब स्वाभाविक रूप से शामिल था।

इसी प्रकार हाथ चक्की से पिसा हुआ आटा भी पोषण की दृष्टि से अधिक लाभकारी माना जाता था। उसमें अनाज का प्राकृतिक तत्व सुरक्षित रहता था, जबकि आधुनिक प्रसंस्करण पद्धतियों में कई बार पोषक तत्व कम हो जाते हैं। अर्थात हमने सुविधा तो प्राप्त कर ली, लेकिन स्वास्थ्य और परंपरा दोनों से दूरी बना ली।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने अतीत को केवल पुरानी कहानी समझकर न भूल जाएं। गुंवारिया जैसे पारंपरिक व्यवसायों का अध्ययन, दस्तावेजीकरण और संरक्षण होना चाहिए। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों को ग्रामीण कारीगरों की विरासत पर शोध करना चाहिए। लोक संस्कृति संग्रहालयों में इन व्यवसायों की जानकारी और उपकरणों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि उनके पूर्वजों का जीवन कैसा था।

विकास आवश्यक है, लेकिन विकास का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं होना चाहिए। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन ही किसी समाज को मजबूत बनाता है। यदि हम अपनी लोक संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और कारीगर समुदायों को भूल जाएंगे, तो हमारी पहचान धीरे-धीरे खो जाएगी।

आज जब हम ‘गुंवारिया’ शब्द सुनते हैं तो शायद केवल एक कहावत याद आती है—“आजकल चक्की रुहाने वाले को मेले में कौन पूछता है?” लेकिन इस कहावत के पीछे एक पूरा इतिहास, एक जीवंत संस्कृति और हजारों परिवारों की आजीविका छिपी हुई है। समय की मांग है कि हम इस विरासत को समझें, उसका सम्मान करें और आने वाली पीढ़ियों तक उसकी कहानी पहुंचाएं।

क्योंकि जो समाज अपने कारीगरों और अपनी लोक संस्कृति को भूल जाता है, वह धीरे-धीरे अपनी आत्मा से भी दूर हो जाता है।

 भीम प्रज्ञा अलर्ट 

"समय बदलने से परिस्थितियां बदल सकती हैं, लेकिन जो व्यक्ति अपनी जड़ों, संस्कारों और मूल्यों को संभालकर रखता है, वही हर बदलाव के बीच अपनी पहचान बचा पाता है।"

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