आरक्षण को लेकर सरकार की नियत में खोट।

संपादकीय@हरेश पंवार
 

आरक्षण को लेकर कई बार पक्ष- विपक्ष में तीखी एवं तल्ख टिप्पणी सुनने को मिलती रहती हैं। कहीं आरक्षण को खैरात बताया जाता है। तो कहीं आरक्षण को मौलिक अधिकार की दलील दी जाती है। पर इस बीच में न्यायपालिका का सहारा लेकर सरकारे ज़रूर ठेंगा दिखाने में कोताही नहीं बरतती है। जब जब देश में आपातकालीन जैसी विषम परिस्थितियां नजर आयी हैं और मौजूदा सरकार जैसे ही सवालों के घेरे में घिरती नजर आयी है। तो जनता का ध्यान मुद्दे से भटकाने के लिए आरक्षण पर गोचाबाजी कर मुद्दे से भटका दिया जाता है। पिछले कुछ समय से ऐसा ही देखा जा रहा है। जब भी कोई चुनाव नजदीक आता है तो सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरक्षण का पिटारा खोलकर वोटों का समीकरण बैठाया जाता है। हाल ही में राज्यसभा चुनाव एवं बिहार के चुनाव को मद्देनजर रखते हुए नीट के रिजर्वेशन मामले में तमिलनाडु हाईकोर्ट के जजमेंट पर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहां की आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं। इस फैसले के बाद देश में फिर से आरक्षण पर बवाल खड़ा कर जंग छिड़ दी है। वैसे ही व्यवस्था में कुंडली मारे बैठे लोग सामाजिक बराबरी नहीं चाहते हैं। संवैधानिक अधिकारों का गला घोट कर कई बार आरक्षण पर टीका टिप्पणी होती रही है। निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि आरक्षण को लेकर सरकार की नियत में  जरूर खोट है। जिसके चलते बार-बार मौके की तलाश में आरक्षण व्यवस्था को खंडित करने के अथक प्रयास किए जा रहे हैं। कहीं आरक्षण को आर्थिक आधार पर पुरजोर पैरवी की जा रही है। तो कहीं सामाजिक आधार को प्रबल बताया जा रहा है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। संपूर्ण लॉकडाउन में गरीब मजदूर व हास्यकृत उन लोगों की एड़ियों को सड़कों पर घिसते हुए देखकर उनकी दरिद्र तस्वीरों के नाम पर चंदा वसूली का कार्यक्रम जारी रखा‌। सरकार ने अपनी गरीबी को दूर करने के लिए गरीबों का सहारा लिया। और यह खेल ठीक उसी प्रकार से जैसे मंदिर मस्जिद के बाहर खड़े भिखारी, भीख मांगते हैं तो अक्सर यही कहते हैं कि दे दे अल्लाह या भगवान के नाम पर। वे अपने लिए नहीं मांगते हैं। बदले में अनेको दुआएं देते नजर आते हैं। मानव भगवान के मालिक भेजी हो। दुआओं में भगवान आपका भला करें। अल्लाह तुम्हें बरकत दे। परंतु यह कभी नहीं समझ में आया कि भगवान के नाम पर मांगते हो, तुम्हें अल्लाह बरकत दे। यदि ये सब दुआएं काम कर ही रहे हैं, तो सवाल यह है कि वे स्वयं के लिए  क्यों नहीं मांग लेते। देश में एक और जहां कोरोना वायरस की जंग को लड़ने के लिए विषम परिस्थितियों में देशवासियों ने एकता, अखंडता का परिचय दिया विषम परिस्थितियों में झूझते हुए सरकार की खाली तिजोरी में दान दक्षिणा दी। लोगों ने इस नाजुक पल में सरकार के आदेश को माना। इसी बीच सरकार ने अपनी खोटी नीत के एजेंटों को कहीं ना कहीं से उजागर करते हुए छीना झपटी का खेल जारी रखा है। आरक्षण को लेकर जो बेईमानी चल रही है। उसे उजागर करने के कुत्सित प्रयास जारी हैं। लगता है इस समय न्यायपालिका के जरिए जो अंदर ही अंदर घालमेल चल रहा है। उससे आरक्षित वर्ग के लोग रुष्ट दिखाई दे रहे हैं। सरकार की यह कूटनीति कहीं लॉकडाउन के विफलता का कारण साबित ना हो जाए। यह पल इतिहास के झरोखों में उल्लेखित होना अभी बाकी है। क्योंकि बार बार साबुन से हाथ धोकर जनता कोरोना से बचने का प्रयास कर रही है। लेकिन  उस नाजुक दौर में भी सुप्रीम कोर्ट के जज  हाथ धोकर आरक्षण के पीछे पड़े हुए हैं। वर्तमान स्थितियां ऐसे संवेदनशील बिंदु पर बहस छेड़ने का समय नहीं है। वर्तमान समय एतिहाद बर्तन का है।
 *आज इतना ही बाकी कल*

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