कोरोना वायरस ने दी दहेज प्रथा को चुनौती।

       
संपादकीय@एडवोकेट हरेश पंवार।
 मनुष्य सामाजिक बुराइयों से लिप्त होकर भौतिकवादी दौड़ में ऐसे संसाधनों का अंधानुकरण कर रहा है। जिसके चलते समाज में प्रतिस्पर्धा का भाव उत्पन्न हो गया है‌। आज सामाजिक आहार व्यवहार में परिवर्तन इस कदर तक पहुंच गया कि आम व्यक्ति की समझ से परे है। सामाजिक बुराइयों का विकराल रूप सामाजिक संरचना के विखंडन का कारण बनता जा रहा है। बहुत सी कुरीतियां समाज में कुष्ठ रोग की तरह से फैली हुई है। लेकिन दहेज प्रथा एक बहुत बड़ी सामाजिक बुराई थी। उस पर अंकुश लगाने के लिए समाज सुधारकों ने सर पटक पटक कर। मंचों पर उपदेशात्मक भाषणों द्वारा चिल्ला चिल्ला कर एवं पोथियों में कोटेशन लिख लिख कर तमाम तरीके के संसाधनों द्वारा दहेज प्रथा पर अंकुश लगाने के अथक प्रयास जारी रखें।लेकिन यह सामाजिक बुराइयां टस से मस होने का नाम नहीं ले रही थी और  कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान होने वाली शादियों में बिना तामझाम को देखकर लगता है, कि दहेज प्रथा पर अब अंकुश लगाने की बारी आई गई। कहीं न कहीं कोरोना वायरस की वजह से चल रहा यह लाॅक डाउन दहेज प्रथा पर जरूर रोक लगा पाएगा। हाल ही में हो रही शादियां और उनके स्वरूप को देखकर लगता है कि सामाजिक व्याधि का रूप धारण कर चुकी दहेज प्रथा का स्वरूप बदल कर समाज में चेतना और जागृति का रुप दिखाई देगा, जो लोग समझदार हैं। उन लोगों ने लॉकडाउन के दौरान बिना तामझाम और दहेज की बिना औपचारिकता के शादियां करके अपने आप को ही नहीं। परंतु दुल्हन पक्ष के पक्षकार को भी महफूज रखने का काम किया है। इसलिए निश्चित रूप से कहा जा सकता है या यूं कहें की लॉकडाउन के कारण देश में आई आर्थिक मंदी से निजात पाने के लिए दहेज़ प्रथा जैसी समस्या से मुंह फेरना ही होगा।  कोविड-19 एक कारगर उपाय प्रतीत हो रहा है। लेकिन कुछ लोग दहेज के लालच में अभी भी लॉकडाउन खुलने और वातावरण ठीक होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उपहार के नाम पर दहेज बटोर सके इसलिए इस गर्मियों की छुट्टियों में जो शादियां करने वाले थे। उन्होंने आगामी अनिश्चितकालीन समय के लिए शादियां पोस्टपेंड कर दी हैं। क्या वास्तव में वेद दहेज के इंतजार में या खर्चीली साथियों की प्रतीक्षा में बैठे हैं। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। इस प्रगति पर मूल्यांकन करे कि समय से पहले और भाग्य से ज्यादा व्यक्ति को कुछ भी ज्यादा नहीं मिलता है। इस कथन को वर्तमान कोविड-19 की परिस्थितियों ने साबित कर दिया है, कि किसी भी चीज का एक समय होता है और उसका जब पतन काल शुरू होता है तो कोई न कोई मार्ग दिखाई देता है। आज वर्तमान में दहेज प्रथा पर रोक लगाने के लिए लॉकडाउन के दौरान तय की गई गाइडलाइन के मुताबिक हो रही शादियां में निश्चित रूप से इस कुप्रथा पर अंकुश लगाने के लिए एक कारगर उपाय साबित होगी। भारत में जन जागरण आंदोलन से लेकर आज तक
समाज सुधारक  की दिशा में लोग- सर पटक- पटक कर चले गए ,गांव- गांव जाकर चपले घीस ली ,पर समाज के लोग सुधरे नही। और एक कोरोना वाइरस ने समाज को अपने आप सुधरने के लिए मजबूर कर दिया है। न सगाई का खर्च,न बैंड न बाराती,न शामियाने न दिखावट न सजावट न बड़े- बड़े विशाल भोज, न अन्न की बरबादी, न बाल-विवाह, न शादी का खर्चा , न गोद भराई, न सूरज पूजा, न मान न मन्नत, न चर्तुमास प्रवेश का ताम-झाम,न भव्याप्ति भव्य जुलूस व रथयात्राएं, न किसी के मरने पर जमघट, न मृत्यु भोज एक वाइरस ने अपने आप समाज को सुधार दिया। इसलिए किसी भी चीज का अति होती है उसका अंत निश्चित है वर्तमान परिपेक्ष को ध्यान में रखते हुए देखा जाए तो दहेज प्रथा के अंत होने का समय आ गया है सामाजिक कुप्रथा को चुनौती देने के लिए कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान बना ये वातावरण तय करता है कि सामाजिक रीति रिवाज और परंपराओं में काफी आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलेगा यह एक राहत की खबर है। लेकिन मनुष्य परंपरागत लिक को पीटते हुए रूढियों के बंधा रहा समाज में परिवर्तन नहीं देखेगा इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस समाज में सामाजिक परिवर्तन के लिए सामाजिक नवा चारों में सबसे पहल की है वह समाज सबसे अग्रणी रहा है चाहे श्वेत क्रांति हो, चाहे हरित क्रांति हो, आईटी टेक्नोलॉजी क्रांति हो जिसने भी सबसे पहले पहल की है वही विनर रहा है। आज की परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए परिवर्तन को सबसे पहले स्वीकारा है वे आगे की ओर गतिमान होंगे। इसलिए समय की नब्ज को पकड़ते हुए बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाने की जरूरत है।
 *आज इतना ही बाकी कल*

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