संपादकीय 17 अगस्त 2025 *"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"* हम कहते हैं कि भारत संस्कृति और संस्कारों की भूमि है, लेकिन जब बात भोजन के प्रति आदर और अनुशासन की आती है तो हमारी थाली हमारी पोल खोल देती है। विवाह-शादियों और दावतों में सजाई गई थालियाँ, डिक्स और तस्तरियों पर रखे नाना प्रकार के व्यंजन जितने आकर्षक लगते हैं, उतना ही कचरे के ढेर पर जाकर अपमानित होते हैं। क्या यही हमारी "सभ्यता" और "मानवता" है कि हम दो निवाले खाने की क्षमता रखते हुए पचास चीजें थाली में भरकर आधा फेंक दें? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। “अरे भाई, आजकल शादी-ब्याह में थाली नहीं, मानो युद्ध का मैदान सजता है। सामने पंक्तिबद्ध सलाद की फौज, मिठाइयों की बटालियन, चाट-पकवानों की तोपें और सब्ज़ियों का टैंक—सब तैनात रहते हैं। लेकिन ज्योंही ‘महामहिम’ मेहमान पंडाल में प्रवेश करते हैं, युद्ध का नारा गूंजता है – ‘जो दिखे, प्लेट में भर लो, दोबारा लाइन कौन लगाएगा!’ और फिर थाली से ज्यादा बर्बाद भोजन नाली में परेड करता हुआ मिलता है।” कितना विचित्र है, हम खुद को “सभ्य समा...
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