शिष्टाचार की आंधी से अहंकार रुपी हवा निकलती है।
संपादकीय।
8/9/2024
*शिष्टाचार की आंधी से अहंकार रुपी हवा निकलती है।*
एक बार कुछ बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे । वहाँ से एक संत जा रहे थे । तभी एक बच्चे ने संत से सवाल किया
गुरुजी : इस फुटबॉल ने कैसे कर्म किए हैं, जो इसे इतनी लातें खानी पड़ रही हैं ? संत ने बहुत सुंदर जवाब दिया कि बेटे, ये इसके कर्म नहीं, बल्कि इसमें जो हवा भरी है, इसीलिए इसे इतनी लातें खानी पड़ रही हैं ।
ठीक इसी तरह हमारे अंदर भी जब तक अहंकार रुपी हवा भरी होती है, तब तक हमें भी अपने जीवन में लातें ही खानी पड़ती हैं..! यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यह एक बहुत ही सुंदर और गहरा उदाहरण है जो हमें अहंकार के नुकसान के बारे में सिखाता है। जैसे फुटबॉल में हवा भरी होती है और उसे लातें पड़ती हैं, वैसे ही हमारे अंदर अहंकार की हवा होती है जो हमें जीवन में चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
शिष्टाचार की आंधी से अहंकार रुपी हवा निकलती है, यह बात बिल्कुल सही है। जब हम शिष्टाचार का पालन करते हैं, तो हमारे अंदर का अहंकार कम होता है और हम दूसरों के प्रति अधिक सहानुभूति और सम्मान के साथ व्यवहार करने लगते हैं।
यह उदाहरण हमें सिखाता है कि हमें अपने अंदर के अहंकार को कम करना चाहिए और शिष्टाचार का पालन करना चाहिए, ताकि हम अपने जीवन में अधिक शांति और सौहार्द प्राप्त कर सकें।
आज के समय में, जब समाज शिक्षित तो हो रहा है, परंतु सुशिक्षित नहीं हो पा रहा है, तब शिष्टाचार की महत्ता और भी बढ़ जाती है। शिष्टाचार की कमी के कारण समाज में व्यावसायिक बुद्धि की प्रधानता हो गई है, जो मानव समाज को मानव होने के गौरव से वंचित कर रही है।
शिष्टाचार का अर्थ है अच्छे व्यवहार, सद्व्यवहार, और दूसरों के प्रति सम्मान। यह हमारे समाज की एकता की कुंजी है, जो हमें एक दूसरे के साथ जोड़ती है और हमें मानव बनाती है।
आज के समय में, जब लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण कर रहे हैं, तब शिष्टाचार की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। हमें अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है, ताकि हम दूसरों के प्रति सम्मान और सद्व्यवहार कर सकें।
शिष्टाचार की सरस्वती को प्रवाहित करने के लिए, हमें अपने दैनिक जीवन में कुछ बातों का ध्यान रखना होगा। हमें अपने शब्दों और कार्यों में सच्चाई और ईमानदारी रखनी होगी। हमें दूसरों के प्रति सम्मान और सद्व्यवहार करना होगा। हमें अपने निजी स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण नहीं करना होगा।
इसके अलावा, हमें अपने समाज और परिवार के प्रति जिम्मेदारी का एहसास करना होगा। हमें अपने समाज और परिवार को एकजुट रखने में अपनी अहम भूमिका निभानी होगी। हमें निस्वार्थ भाव से समाज और परिवार की सेवा करनी होगी।
अगर हम शिष्टाचार की सरस्वती को प्रवाहित करेंगे, तो हम अपने समाज और परिवार को एकजुट रख पाएंगे। हम अपने दैनिक जीवन में सच्चाई और ईमानदारी का पालन कर पाएंगे। हम दूसरों के प्रति सम्मान और सद्व्यवहार कर पाएंगे। और हम अपने निजी स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण नहीं कर पाएंगे।
इसलिए, आइए हम शिष्टाचार की सरस्वती को प्रवाहित करने के लिए काम करें और अपने समाज और परिवार को एकजुट रखने में अपनी अहम भूमिका निभाएं।
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