जीवन की यात्रा में दो पल की जिंदगी- गुमान किस बात का।

संपादकीय 


उच्च पद का अधिकारी और निम्न वर्ग का कर्मचारी, सेवानिवृत्त होने के बाद समाज में सभी एक फ्यूज बल्ब की तरह होते हैं, इनमें कोई छोटा बड़ा नहीं होता। सभी एक समान होते हैं। हालांकि गुणों के आधार पर उसका समाज में सम्मान अवश्य होता है।
      इसलिए ऊंचा होने का गुमान और छोटा होने का मलाल सब मिथ्या है क्योंकि खेल खत्म होने के बाद शतरंज के सब मोहरे एक ही डिब्बे में रखे जाते हैं जिसके फलस्वरूप हर व्यक्ति अपने व्यवहार, मधुर संबंध और सकारात्मक कार्यशैली के आधार पर ही समाज और परिवार में सम्मानित होने का पात्र बनता है।
मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
जीवन की यात्रा में हमें उच्च पद और निम्न वर्ग के भेदभाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद हम सभी एक समान हो जाते हैं। हमारे पद और वर्ग का कोई महत्व नहीं रहता है, क्योंकि हम सभी एक फ्यूज बल्ब की तरह हो जाते हैं।

इसलिए, हमें ऊंचा होने का गुमान और छोटा होने का मलाल नहीं करना चाहिए। हमें अपने गुणों, व्यवहार, मधुर संबंधों और सकारात्मक कार्यशैली पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि खेल खत्म होने के बाद शतरंज के सब मोहरे एक ही डिब्बे में रखे जाते हैं, और हमारा समाज और परिवार में सम्मानित होने का पात्र बनने के लिए हमें अपने व्यवहार और कार्यशैली पर ध्यान देना होगा।

संतमत की रीत हमें यही सिखाती है - जीवन की यात्रा में हमें दो पल की जिंदगी जीनी चाहिए। हमें अपने जीवन को सकारात्मकता से भरना चाहिए और दूसरों के जीवन में भी खुशियां बांटनी चाहिए। हमें अपने गुणों को विकसित करना चाहिए और मधुर संबंध बनाने चाहिए।

इसलिए, आइए हम अपने जीवन को दो पल की जिंदगी के रूप में जीने का प्रयास करें और संतमत की रीत का पालन करें। हमें अपने व्यवहार, मधुर संबंधों और सकारात्मक कार्यशैली के आधार पर ही समाज और परिवार में सम्मानित होने का पात्र बनना चाहिए।
जीवन की यात्रा में हमें प्रकृति ने एक दूसरे से मिलवाया है, लेकिन संबंधों की दूरियों या नजदीकियों का निर्धारण हमारा व्यवहार ही करता है। इसलिए, हमें सबको हंसाना चाहिए, लेकिन कभी किसी पर हंसना नहीं चाहिए। हमें सबके दुख बांटने चाहिए, लेकिन किसी को दुखी नहीं करना चाहिए। हमें सबकी राह में दीप जलाना चाहिए, लेकिन किसी का दिल नहीं जलाना चाहिए।

यही संतमत की रीत है - जैसा बोओगे, वैसा ही पाओगे। हमारे जीवन के दो पल ही हैं, इसलिए हमें इन्हें सावधानी से जीना चाहिए। हमें फूलों की तरह रहना चाहिए और खुशबू की तरह बिखरना चाहिए।

इसलिए, हमें अपने जीवन को दो उसूलों पर आधारित करना चाहिए:

1. हमें दूसरों के साथ मधुर संबंध बनाने चाहिए और उन्हें खुश रखना चाहिए।
2. हमें अपने जीवन को सकारात्मकता से भरना चाहिए और दूसरों के जीवन में भी खुशियां बांटनी चाहिए।

अगर हम इन दो उसूलों पर अमल करेंगे, तो हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं और दूसरों के जीवन में भी खुशियां बांट सकते हैं। इसलिए, आइए हम अपने जीवन को दो पल की जिंदगी के रूप में जीने का प्रयास करें और संतमत की रीत का पालन करें।

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