पुस्तक समीक्षा-आदिवासी पत्रकारिता: एक पहचान

पुस्तक समीक्षा-
           समीक्षक:- 
*एडवोकेट हरेश पंवार* 

 डॉ. रूपचंद गौतम ने अपनी पुस्तक 'आदिवासी पत्रकारिता' में एक महत्वपूर्ण काम किया है, जो देश भर के आदिवासी पत्रकारों के  संघर्ष और लेखन सामग्री को संग्रहीत किया है। इस पुस्तक के माध्यम से, लेखक ने आदिवासी पत्रकारों को एक मंच प्रदान किया है, जहां वे अपनी आवाज उठा सकते हैं और अपने संघर्षों को साझा कर सकते हैं।

लेखन के क्षेत्र में अलग-अलग विद्वानों ने अलग-अलग विषयों पर शोध कार्य किया है, लेकिन भारतीय इतिहास में दलित, आदिवासी और अंबेडकर जनसंचार जैस पत्रकारिता के विषयों को गहराई से और विस्तार से अध्ययन यदि किसी विद्वान ने किया है तो उनमें से डॉ रूपचंद गौतम का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। मेरे अभिरुचि के विषय पत्रकारिता और चुनौती में आदिवासी पत्रकारिता नामक पुस्तक जब मुझे उपहार में मिली, मैंने इस पुस्तक को गहराई से पढ़ा और जो समझा उसकी समीक्षात्मक विवेचन टिप्पणी आप सुधी पाठकों तक संप्रेषित कर रहा हूं। उम्मीद करता हूं। आपको भी यह पुस्तक पसंद आयेगी। इस पुस्तक के ज्ञान सारांश शीर्षक में ही निहित है। 

पुस्तक में आदिवासी पत्रकारों के सामने आने वाली चुनौतियों को उजागर किया गया है, जिनमें उनकी सांस्कृतिक विरासत, भाषा और परंपराओं का क्षरण शामिल है। इसके बावजूद, आदिवासी पत्रकार अपने अधिकारों, पहचान और अभिव्यक्ति के लिए जो संघर्षी जद्दोजहद कर रहे  हैं उसका बखूबी से जिक्र किया गया है। डॉ. गौतम का यह साहसिक कार्य उनके साहस और समर्पण का प्रमाण है।
लेखक ने आदिवासी साहित्य और पत्रकारिता में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जो आदिवासी समुदाय के संघर्षों और आकांक्षाओं को प्रदर्शित करता है। यह पुस्तक एक आह्वान है, जो आदिवासी बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सांस्कृतिक मूल्य रक्षक कार्यकर्ताओं को इस आंदोलन में शामिल होने और अपनी आवाज उठाने के लिए प्रेरित करती है।

इस पुस्तक के माध्यम से, डॉ. गौतम ने न केवल आदिवासी पत्रकारों को सशक्त बनाया है, बल्कि एक नई पीढ़ी के लेखकों और विचारकों को भी प्रेरित किया है। ताकि वे सशक्त होकर आदिवासी पत्रकारिता की  वकालत कर सकें। निश्चित रूप से यह आदिवासी अधिकारों और पहचान की लड़ाई जारी है, और यह पुस्तक इस लड़ाई के  संघर्ष में एक शक्तिशाली हथियार माना जा सकता है।

आदिवासी पत्रकारिता आज एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है, जहां जल, जंगल, जमीन के आंदोलनों का विश्लेषण और ऐतिहासिक दृष्टि से आदिवासियों के मूल निवास स्थान का विवेचन करना आवश्यक हो गया है। आदिवासी क्षेत्रों से शहरों की ओर विस्थापन के साथ भाषा में भी बदलाव हो रहा है, जिससे कुछ आदिवासी भाषाएं लुप्ति की स्थिति में हैं।
आदिवासी पत्रकारिता का कर्त्तव्य है कि वह आदिवासियों को उनकी अस्मिता का अहसास कराते हुए उन्हें बाजारवाद के प्रभाव में जाने से रोके। इसमें सांस्कृतिक नेतृत्व की बड़ी भूमिका हो सकती है, और आदिवासी पत्रकार इस मुहिम को जन-जन तक ले जा सकते हैं।
आदिवासी वृद्धिजीवियों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सांस्कृतिकर्मियों के समक्ष चुनौतियाँ हैं, लेकिन आदिवासी पत्रकार गैर आदिवासियों से तो जुझ ही रहा है, बल्कि शहरों में रह रहे उन आदिवासियों से भी जुझ रहा है जो भौतिकता के चक्कर में अपनी आदिवासियत को छोड़ रहे हैं।

आदिवासी पत्रकारिता के सामने कई चुनौतियाँ हैं, जिनमें से एक सबसे बड़ी चुनौती है अपनी आवाज़ को मुख्यधारा की पत्रकारिता में शामिल कराना। सैकड़ों आदिवासी पत्रकारों को मीडिया समूहों से जोड़ने के बजाय, उन्हें सहानुभूति के रूप में आदिवासियों पर कलम चलाने के लिए मजबूर किया जाना।

आदिवासी पत्रकारिता का उद्देश्य है अपनी भाषा और संस्कृति को अकादमिक स्तर पर देखना और जनगणना कॉलम में आदिवासी धर्म के लिए अलग से कॉलम की मांग करना। आदिवासी पत्रकारिता ने कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जिनमें से एक है 'निष्कलंका' पत्रिका का प्रकाशन, जिसने डॉ. अम्बेडकर के विचारों को आदिवासियों तक पहुँचाया।

संभवतः आदिवासी पत्रकारिता पर पुस्तकें नहीं होने के कारण, डॉ. रूपचन्द गौतम जैसे लेखकों को इस विषय पर पुस्तकें लिखनी पड़ी हैं। आदिवासी पत्रकारिता को अपनी जिम्मेदारियों को समझने और उन्हें पूरा करने के लिए संघर्ष करना जरूरी है।

डॉ. रूपचंद गौतम की पुस्तक "आदिवासी पत्रकारिता" का आवरण पृष्ठ आदिवासी संस्कृति की मूल झलक और महिलाओं के संघर्षीं जीवन को दर्शाता है, जो पुस्तक के विषय को सुंदरता से प्रस्तुत करता है। एकैडमिक पब्लिकेशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का मूल्य 595 रूपए अंकित है तथा पुस्तक के आईएसबीएन नंबर व बार स्कैन कोड आवरण पृष्ठ के पिछले भाग पर दर्शाया गया है। साथ ही में लेखक का परिचय, शिक्षा, दीक्षा, अध्ययन, अध्यापन, लेखन और पुस्तक संपादन का विवरण भी दिया गया है, जो पाठकों को लेखक के बारे में जानने में मदद करता है।

पुस्तक का आवरण पृष्ठ आदिवासी संस्कृति की समृद्धि और विविधता को दर्शाता है, जो पुस्तक के विषय को और भी आकर्षक बनाता है। डॉ. रूपचंद गौतम की यह पुस्तक आदिवासी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो आदिवासी समुदाय की आवाज़ को मुख्यधारा की पत्रकारिता में शामिल करने में मदद करेगी।
डॉ. रूपचंद गौतम की पुस्तक "आदिवासी पत्रकारिता" एक व्यापक और गहन अध्ययन है, जो आदिवासी पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं को शामिल करती है। पुस्तक की विषय सूची में आदिवासियत, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, आदिवासी पत्रकारिता का अर्थ और अवधारणा, हैंडबिल, पोस्टर, बुकलेट, स्मारिकाएं, आदिवासी पत्र-पत्रिकाएं, और आदिवासी पत्रकारिता तथा आंदोलन के प्रमुख आदिवासी पत्र-पत्रिकाओं का मूल्यांकन शामिल है।

पुस्तक में देशभर की आदिवासी पत्र-पत्रिकाओं का विश्लेषण किया गया है, जैसे कि आदिवासी पत्रिका, आदिवासी, कृतसंकल्प, जग ज्योति, गोंडवाना दर्शन, सरना फुल, अरावली उद्घोष, मानगढ़ संदेश, दलित आदिवासी दुनिया,जय मीनेश,वनांचल स्मारिका, आदिवासी सत्ता, कुंडुख डहरे, कूंडुख कत्था बींडरना, अभिनंदन ग्रंथ, उड़ान, वेदिया अनुसूचित जनजाति झारखंड धारा, झारखंड भाषा साहित्य अखड़ा, निरंग पझरा, आदिवासी साहित्य, गोंडवान संदेश, आदिवासी भारत आदि। इसके अलावा, पुस्तक में आदिवासी पत्रकारिता के समक्ष मुद्दों, जैसे कि विस्थापन, अस्मिता, साहित्य, मनोरंजन, कला, संस्कृति, और आदिवासी सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से जागृति लाने वाले यूट्यूबर्स की सांस्कृतिक झलक चेतना को भी शामिल किया गया है।

पुस्तक में प्रमुख आदिवासी पत्रकारों के जीवन और संघर्षों का भी वर्णन किया गया है, जैसे कि देवेंद्र नाथ, सुशीला, जयपाल सिंह मुंडा, वॉल्टर भेंगरा, सुन्हेर सिंह ताराम, डीपी वर्मा, पथिक वंदना टेटे, आशा रमेश ठाकुर, अर्जुन इंदवार, डॉ. वासवी कीड़ों आदि।
 पुस्तक के अंत में संदर्भ ग्रंथ सूची में आदिवासी पत्रकारिता को तालीम देने वाले पत्र-पत्रिकाएं, पुस्तकें, स्मारिकाएं, लेखक, प्रकाशक, संपादक, और संपादित होने वाले स्थान का वर्णन किया गया है, जो पाठकों और शोधार्थियों को इस विषय के बारे में गहराई से जानने में मदद करेगा और उनकी रुचि को और भी अधिक अभिप्रेरित करेगा।

पुस्तक के बीच में पत्र-पत्रिकाएं और स्मारिकाओं के आवरण पृष्ठ की तस्वीरें शामिल करना भी एक अच्छा विचार है, जिससे पाठकों को आदिवासी पत्रकारिता के इतिहास और विकास का एक दृश्य समझ मिलेगा।

यह पुस्तक वास्तव में भारतीय आदिवासी पत्रकारिता के लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है, जो आदिवासी चेतना के लिए मील का पत्थर साबित होगी। यह पुस्तक आदिवासी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नया दिशा देगी और आदिवासी समुदाय की आवाज़ को मुख्यधारा की पत्रकारिता में शामिल करने में मदद करेगी।
 लेखक डॉ रूपचंद गौतम साहब के इस साहसिक कार्य को हृदय के गहराई से सेल्यूट करते हैं जिन्होंने बिखरे हुए विषय को पुस्तक में संकलित कर न केवल साहित्य जगत में बल्कि पत्रकारिता के इतिहास की इस श्रृंखला को आगे बढ़ाया है। डॉ गौतम साहब को ढेर सारी मंगल कामनाएं और उनकी लेखन अभिरुचि का हृदय की गहराई से अभिनंदन। कुशल स्वास्थ्य की मंगल कामनाएं। 

 *एडवोकेट हरेश पंवार* 
संपादक - दैनिक भीम प्रज्ञा 
 *कार्यालय: भीम प्रज्ञा मीडिया हाउस एण्ड सेंट्रल लाइब्रेरी, बुहाना रोड पचेरी बड़ी, जिला झुंझुनू, राजस्थान 333515.* 
मो. 9983040937,     
      8209444810

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