मानव की सच्ची भक्ति: प्रकृति और इंसानियत के साथ*

संपादकीय-31 अक्टूबर 2024
*मानव की सच्ची भक्ति: प्रकृति और इंसानियत के साथ*
दीपावली की रोशनी में हमें अपने जीवन की सच्ची भक्ति की याद आती है। यह भक्ति नहीं है किसी देवता की पूजा करने की, बल्कि यह है इंसानियत और प्रकृति के साथ प्रेम रखने की। प्रकृति ने हमें इतनी सुंदर दुनिया दी है, और हमें इसकी व्यवस्थाओं का सम्मान करना चाहिए। यह मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है
       इंसान, इंसानियत और प्रकृति इन तीनों से प्रेम रखना ही मानव की सच्ची भक्ति है। प्रकृति ने कमाल की व्यवस्थाएं कर रखी हैं। बीज छोटा होता है लेकिन उसका फल, मतलब बीज की साइज़ से, फल बड़ा होता है। हमारा कर्म चाहे कितना भी छोटा हो लेकिन प्रकृति उसका फल हमें बड़ा ही देती है।
         जब हम प्रकृति का लुत्फ उठाकर अपना सही कर्म कर रहे होते हैं तो निश्चय ही उसका अच्छा फल मिलता हैं। बाकी तो वह जानवर भी अच्छे हैं जो मालिक की रोटी खाते हैं और उसकी हाजिरी भी बजाते हैं। हर परिवार में अक्सर ऐसे नमूने होते हैं, जो अपनों से जलते हैं और गैरों के जूते पॉलिश करने में गर्व महसूस करते हैं।
प्रकृति की व्यवस्थाएं हमें सिखाती हैं कि हमारा कर्म चाहे कितना भी छोटा हो, लेकिन उसका फल हमें बड़ा ही मिलता है। यह हमें अपने जीवन में सही कर्म करने की प्रेरणा देता है। लेकिन आजकल हम देखते हैं कि कई लोग अपनों से जलते हैं और गैरों के जूते पॉलिश करने में गर्व महसूस करते हैं। यह नहीं है मानव की सच्ची भक्ति।
मानव की सच्ची भक्ति है इंसानियत के साथ प्रेम रखना, प्रकृति की व्यवस्थाओं का सम्मान करना, और अपने कर्मों का फल पाना। यही है हमारी सच्ची भक्ति, जो हमें जीवन में 
सफलता और संतुष्टि दिलाती है।
इस दीपावली पर, आइए हम अपने जीवन में इस सच्ची भक्ति को अपनाएं और प्रकृति और इंसानियत के साथ प्रेम रखें।

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