समाज की बर्बादी का कारण: कुप्रथाएं और रीति-रिवाज

Haresh panwar @18 November 2024
*समाज की बर्बादी का कारण: कुप्रथाएं और रीति-रिवाज*
आज के समाज में प्रचलित अनेक कुप्रथाएं और रीति-रिवाज परिवार और समाज की बर्बादी का कारण बन गए हैं। ये कुप्रथाएं न केवल आर्थिक रूप से बल्कि मानसिक और सामाजिक रूप से भी हमें कमजोर कर रही हैं। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। कुप्रथाएं व रीति रिवाज का प्रचलन समाज में इस कदर व्याप्त हैं  जो परिवार व समाज की बर्बादी का कारण बना है।

समाज में प्रचलित अनेकों ऐसी कुप्रथाओं के चलते आज समाज इतना जर्जर हो गया है कि सहज रूप में जीवनयापन करना भी चुनौती बन गया है। पारिवारिक व सामाजिक जिम्मेदारियों की बात करें तो बच्चों की मंहगी पढ़ाई, उनका विवाह करने जैसी चिंताएं माता पिता को परेशान कर रही हैं। मंहगाई व बेरोजगारी के चलते दहेज़ और सामाजिक कुप्रथाओं के चक्कर में गरीब व मध्यम वर्गीय परिवार सक्षमता से अधिक जीवनभर की गाढ़ी कमाई खर्च करने में विवश हो रहे हैं।
     यहां यह विडम्बना ही है कि देश के शिक्षित लोग भी एक दूसरे को देखकर जातिगत व अंधविश्वास के आयोजन, मुण्डन, जनेऊ व मृत्युभोज आदि के आयोजनों में खर्च करके मेहनत की कमाई बर्बाद कर रहे हैं । विवेक का ऐसे हालात में परास्त होना आम बात है । आम इंसान इन कुरुतियों से छुटकारा भी पाना चाहता है । समझने और स्वयं विचार करने पर इंसान को खुद भी अपनी बुराई का अहसास हो जाता है । अतः बर्बादी से बचने के लिए इन कुप्रथाओं व रिवाजों के पीछे भागने से पूर्व गहन विचार अवश्य करें।      
एक ओर जहां मंहगाई और बेरोजगारी के चलते गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करने में विवश हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर शिक्षित लोग भी जातिगत और अंधविश्वास के आयोजनों में खर्च करके अपनी मेहनत की कमाई बर्बाद कर रहे हैं।

इन कुप्रथाओं के चलते हमारा समाज जर्जर होता जा रहा है। बच्चों की मंहगी पढ़ाई, उनका विवाह करने जैसी चिंताएं माता-पिता को परेशान कर रही हैं। दहेज़ और सामाजिक कुप्रथाओं के चक्कर में गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार अपनी सक्षमता से अधिक जीवनभर की गाढ़ी कमाई खर्च करने में विवश हो रहे हैं।

इन कुरुतियों से छुटकारा पाने के लिए हमें गहन विचार करना होगा। हमें अपने विवेक का उपयोग करके इन कुप्रथाओं के पीछे भागने से बचना होगा। हमें समझना होगा कि ये कुप्रथाएं हमारे समाज की बर्बादी का कारण हैं और हमें इनसे मुक्ति पानी होगी।

आवश्यक है कि हम अपने समाज को इन कुप्रथाओं से मुक्त कराएं और एक नए, तर्कसंगत और विकसित समाज की ओर बढ़ें।

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