बदले की आग से बचने का उपाय

संपादकीय@हरेश पंवार 
 
 *बदले की आग से बचने का उपाय* 
ईर्ष्या के वशीभूत होकर बदले की भावना जहीन में पाल लेने से विनाश का कारण बनता है। बदले की भावना एक ऐसा मानसिक वायरस है जो व्यक्ति को विनाश के मार्ग पर ले जाता है। जिसके कारण उत्पन्न अपराध निकट रिश्तों में ही देखने को मिल सकता है।
बदले की भावना एक ऐसी आग है जो हमारे समय, स्वास्थ्य और जीवन को नष्ट कर सकती है। यह आग हमारे मन में एक बार जलने के बाद, हमें दूसरों से बदला लेने के लिए प्रेरित करती है। लेकिन क्या यह बदला लेने की भावना वास्तव में हमें सुखी और आनंदमय जीवन प्रदान कर सकती है?

उत्तर है नहीं। बदले की आग से बचने का एकमात्र उपाय है स्वयं को बदलना। जब हम दूसरों से बदला लेने की कोशिश करते हैं, तो हम अपने समय और ऊर्जा को व्यर्थ में खर्च करते हैं। इसके बजाय, हमें अपने स्वयं के दोषों और कमियों पर काम करना चाहिए। यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 

बदले की भावना हमारे समय को ही नष्ट नहीं करती बल्कि हमारे स्वास्थ्य और जीवन को भी नष्ट कर देती हैं। हमारा जीवन दूसरों से ज्यादा स्वयं की दृष्टि में श्रेष्ठ एवं पवित्र होना चाहिए । केवल किसी के बुरे कहने मात्र से हमारा जीवन बुरा नहीं बन जाता है। किसी से बदला लेने का नहीं अपितु स्वयं को बदल डालने का विचार ज्यादा श्रेष्ठ है। बदले की आग मशाल की तरह दूसरों से पहले स्वयं को ही जलाती है।
     सहनशीलता के शीतल जल से जितना शीघ्र हो सके, इस बदले की आग को रोकना ही बुद्धिमत्ता है। बदले की भावना हमारे समय को ही नष्ट नहीं करती अपितु हमारे स्वास्थ्य और जीवन तक को नष्ट कर जाती है। दुनिया को बदल पाना बड़ा मुश्किल है । इसलिए स्वयं को बदलने में ही अपनी ऊर्जा को लगाना सुखी एवं आनंदमय जीवन का एक मात्र उपाय है ।

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति आपके प्रति बुरा व्यवहार करता है, तो आपको बदले की आग में जलने के बजाय, अपने स्वयं के व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। आप स्वयं से पूछ सकते हैं कि क्या आपने भी उस व्यक्ति के प्रति कुछ गलत किया है? क्या आपने उसकी भावनाओं का सम्मान किया है? जब आप अपने स्वयं के दोषों पर काम करते हैं, तो आप अपने जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हैं।

इसलिए, बदले की आग से बचने का उपाय है स्वयं को बदलना। जब आप अपने स्वयं के दोषों पर काम करते हैं, तो आप अपने जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़ते हैं। तो आइए, बदले की आग से बचने के लिए स्वयं को बदलने का प्रयास करें।

Comments

Popular posts from this blog

संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज

"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"

पचेरी की बहू नीलम सोनी ने अंग्रेजी विषय में किया नेट जेआरएफ क्वालिफाइड।