पवित्र हृदय और प्रसन्न चेहरे का महत्व
संपादकीय:@हरेश पंवार
दिनांक 14 दिसम्बर2024
*पवित्र हृदय और प्रसन्न चेहरे का महत्व*
एक सज्जन के चार बेटियां थी, एक का नाम संपत्ति, दूसरे का नाम धनपति, तीसरे का नाम ज्ञानपति और चौथी का नाम इज्जत नाम था। उस सज्जन व्यक्ति ने चारों बेटियों का पालन पोषण बड़े लाड प्यार से कर उन्हें खूब पढ़ाया, प्यार, स्नेह, सत्कार दिया। सनातन परंपरा के अनुसार उस सज्जन व्यक्ति ने समय के अनुसार चारों बेटियों को अच्छा पढ़ा लिखा पालन पोषण कर शादी विवाह कर विदा करना चाह। बारी-बारी से बेटियों का विदाई की बेला आई तो वह सज्जन व्यक्ति बड़ा खुश था। घर से जब संपत्ति विदा हुई तो उसका आत्मविश्वास बरकरार था। वह जानता था की संपत्ति आती जाती है यह कभी सुख तो कभी दुख देती रही है। संपत्ति जिस गति से जाएगी कभी उस गति से लौट भी आएगी। वह सज्जन बिल्कुल नहीं घबराया दूसरी बेटी धनपति को विदा करने लगा तो उसे भी हंसी-खुशी से विदा कर दिया। वह जानता था कि घर में धन आता जाता रहता है। तीसरी पुत्री ज्ञानपति को भी इसलिए हंसी खुशी से विदा कर दिया क्योंकि सरस्वती अर्थात ज्ञानपति जहां भी जाएगी वहां विस्तार करेंगे और पीछे भी जो कुछ है वह छोड़ कर जाएंगे। लेकिन सबसे छोटी बेटी इज्जत की विदाई बेला आई तो वह सज्जन फूट-फूट कर रोने लगा। उक्त चारों बहनों ने अपने पिता से कारण पूछा कि हमारी विदाई पर आप खुश थे, घबराएं नहीं, रोए नहीं, लेकिन इज्जत की विदाई पर आप फूट-फूट कर क्यों रोने लगे। तब उसे सज्जन व्यक्ति ने जो कहा वह बहुत ही प्रासंगिक है। उसने कहा संपत्ति, धनपति ज्ञानपति (सरस्वती) यह चली जाएगी तो वापस भी आ जाएंगी जायेगी कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन जिस घर से इज्जत विदा हो गई तो वह कभी वापस लौट कर नहीं आएगी। बस इसी बात का मलाल है, इसलिए आंखों में आंसू छलक आए।
इसलिए दोस्तों जीवन में सुख समृद्धि के लिए चरित्र निर्माण का बड़ा महत्व है।
जीवन में सुख और शांति प्राप्त करने के लिए, हमें अपने हृदय की पवित्रता और चेहरे की प्रसन्नता पर ध्यान देना चाहिए। यदि हमारे हृदय में पवित्रता और चेहरे पर प्रसन्नता है, तो हमारा जीवन सुखद और श्रेष्ठ बन जाता है। वास्तव में यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
चेहरे में प्रसन्नता और हृदय में पवित्रता हो तो इससे बढ़कर सुखद एवं श्रेष्ठ जीवन नहीं हो सकता । चरित्र और वस्त्र कितने भी चमकदार हो, देखने वाला सिर्फ दाग पर ही ध्यान देगा.. उदासी में किये गये प्रत्येक कर्म में पूर्णता का अभाव पाया जाता है। हमें प्रयास करना चाहिए कि प्रत्येक कर्म को प्रसन्नता के साथ किया जाए। निष्कपट, निर्दोष और निर्वैर भाव ही हृदय की पवित्रता है।
यदि जीवन में कोई बहुत बड़ी उपलब्धि है तो वह हमारे हृदय की पवित्रता ही है। पवित्र हृदय से किये गये कार्य भी पवित्र ही होते हैं। हमारी जिह्वा में सत्यता हो, चेहरे में प्रसन्नता हो और हृदय में पवित्रता हो तो इससे बढ़कर सुखद एवं श्रेष्ठ जीवन और नहीं हो सकता है। चरित्र निर्माण में सालों साल लग जाते हैं लेकिन दाग लगने में पलक झपकते ही लापरवाही से कभी भी लग सकता है। जीवन पर्यंत यह प्रयास होना चाहिए कि हमारे चरित्र पर कभी दाग में लगे चरित्र पर दाग हमेशा दोष का कारण बनता है। क्योंकि चरित्र और वस्त्र कितने भी चमकदार हों, देखने वाला सिर्फ दाग पर ही ध्यान देगा। इसका अर्थ है कि हमारे बाहरी रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण हमारे हृदय की पवित्रता है। यदि हमारे हृदय में पवित्रता नहीं है, तो हमारे कार्य भी पवित्र नहीं होंगे।
उदासी में किये गये प्रत्येक कर्म में पूर्णता का अभाव पाया जाता है। हमें प्रयास करना चाहिए कि प्रत्येक कर्म को प्रसन्नता के साथ किया जाए। निष्कपट, निर्दोष और निर्वैर भाव ही हृदय की पवित्रता है।
एक उदाहरण के रूप में, यदि एक व्यक्ति अपने कार्य में पूरी तरह से समर्पित है और अपने हृदय में पवित्रता रखता है, तो वह अपने कार्य में सफलता प्राप्त करेगा। लेकिन यदि वह अपने कार्य में उदासी और नकारात्मकता के साथ काम करता है, तो वह अपने कार्य में असफल हो जाएगा।
इसलिए, हमें अपने हृदय की पवित्रता और चेहरे की प्रसन्नता पर ध्यान देना चाहिए। यदि हमारे हृदय में पवित्रता और चेहरे पर प्रसन्नता है, तो हमारा जीवन सुखद और श्रेष्ठ बन जाता है। हमारी जिह्वा में सत्यता हो, चेहरे में प्रसन्नता हो और हृदय में पवित्रता हो तो इससे बढ़कर सुखद एवं श्रेष्ठ जीवन और नहीं हो सकता है।
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