विकट परिस्थितियों में जीवन की सच्ची परीक्षा

संपादकीय@हरेश पंवार 

 *विकट परिस्थितियों में जीवन की सच्ची परीक्षा* 
सुख कभी, तो दुख कभी-कभी, ये संसार की रीत है। आज जिसकी हर है, तो कल उसकी जीत है। क्या राम और घनश्याम पर कभी काली घटा छाई नहीं? क्या उन पर दुखों की विपत्ता आई नहीं? दुख सुख तो दिन रात है, एक रंग है तो दूजा छांव है, जो दिन निकलते ही उजाले में बदल जाते हैं। अतः मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

जीवन की सच्ची परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए व्यक्ति को हर परिस्थिति में संघर्ष करने का आदी होना चाहिए हर समस्या और समाधान से मुकाबला करने की ताकत मन मस्तिष्क में धारण करनी चाहिए मन के हर हर और मन के जीते जीत मन की प्रबल इच्छा शक्ति के बल पर दुनिया की सारी कायनात को जीता जा सकता है।
जीवन में विकट परिस्थितियों का सामना करना एक आम बात है। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इन परिस्थितियों में भी अपने आप को संभाल लेते हैं और जीवन की सच्ची परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं।
जिस इंसान ने विकट परिस्थितियों में अपनों को बदलते देखा है, वो जिंदगी में हर परिस्थिति का सामना कर सकता है। ऐसे लोगों ने जीवन की सच्ची परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कला सीख ली होती है। वे जानते हैं कि जीवन में सुख और दुख दोनों ही आते हैं, और उन्हें दोनों ही स्थितियों में खड़े रहने की क्षमता रखनी होती है। 
वर्तमान समय में जीवन की सच्ची परीक्षा और भी कठिन हो गई है। जुते शोरूम में और किताबें फुटपाथ पर, शराब दुकानों पर और दूध गली गली में, कुत्ते महलों में और माँ बाप वृद्धाश्रम में होते हैं। यह एक ऐसा समय है जब जीवन की सच्ची परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए हमें अपने आप को मजबूत बनाना होगा।
एक शायर की दो लाइन याद आती है:- ना दिन से रिश्ता है ना रात से रिश्ता है । हर शख्स का इस दुनिया में हालात से रिश्ता है। यह एक ऐसा समय है जब हमें अपने जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिए संघर्ष करना होगा।
याद रखना एक दिन कहानी बन कर रह जाएंगे हम ! इसलिए कोशिश करें कि जीवनशैली की कहानी "अच्छी" हो। आइए हम अपने जीवन को सही दिशा में ले जाने के लिए संघर्ष करें और जीवन की सच्ची परीक्षा में उत्तीर्ण हों।
       आज के युग में भौतिकवाद की और अग्रेषित हमारी नई पीढ़ी संस्कारों से विमुख होकर स्वार्थ के बाली चढ़ती जा रही है। हमारे बुजुर्गों के अनुभव की सुनता ही कौन है थोड़ी सी हवा मिलते ही भौतिकवाद के शब्द ग्लोबलाइजेशन विलेज में अपने कदम इस कदर रखते हैं की वापस हकीकत की दुनिया में आना ही नहीं जाते। समय की मांग ने बच्चों को अच्छी तालीम दिलाने की लालसा ने मां बाप ने बच्चों को पढ़ने के लिए दूर भेज दिया फिर जॉब की तलाश में बच्चे उसी कल्चर ढल गए तो संस्कारों से वंचित रह गए और यही कारण है कि आज छोटे-छोटे कस्बे से लेकर गांव और ढ़ाणियों में वृद्ध आश्रम खोले जाने की बात सामने आ रही है। यह चिंता का विषय नहीं यह समय की मांग है जो वातावरण हमने तैयार किया है उसे वातावरण का सामना करने की क्षमता भी विकसित करनी चाहिए।

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