स्वाभिमान और अभिमान: दो अलग-अलग दृष्टिकोण
संपादकीय@हरेश पंवार
*स्वाभिमान और अभिमान: दो अलग-अलग दृष्टिकोण*
स्वाभिमान और अभिमान दो ऐसे शब्द हैं जो अक्सर एक दूसरे के साथ जुड़े होते हैं, लेकिन वास्तव में ये दोनों शब्द एक दूसरे से बहुत अलग हैं। स्वाभिमान एक ऐसा गुण है जो हमें अपने आत्मसम्मान और गरिमा को बनाए रखने में मदद करता है, जबकि अभिमान एक ऐसा गुण है जो हमें दूसरों को नीचा दिखाने और अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
अभिमान कभी झुकना पसंद नहीं करता और स्वाभिमान गलत के आगे कभी झुकने नहीं देता है। निर्भीकता से सत्य के पक्ष में खड़े रहना ही स्वाभिमान है। स्वाभिमान का अर्थ अपनी बात पर अड़े रहना नहीं अपितु सत्य के साथ खड़े रहना है। दूसरों को नीचा दिखाते हुए अपनी बात को सही सिद्ध करने का प्रयास करना यह स्वाभिमानी का लक्षण नहीं, अपितु दूसरों की बात को यथायोग्य सम्मान देते हुए किसी भी दबाव में ना आकर सत्य पर अडिग रहना यही स्वाभिमान है।
वहीं अभिमानी इंसान वह है जो अपने अहंकार के पोषण के लिए दूसरों को कष्ट देना पसंद करता है और स्वाभिमानी वह है जो सत्य के रक्षण के लिए स्वयं कष्टों का वरण कर लेता है। अभिमान झुकना पसंद नहीं करता लेकिन स्वाभिमान गलत के आगे कभी झुकने नहीं देता है।
स्वाभिमान एक ऐसा गुण है जो हमें सत्य के पक्ष में खड़े रहने और अपने आत्मसम्मान को बनाए रखने में मदद करता है। यह हमें दूसरों की बात को यथायोग्य सम्मान देते हुए, अपने विचारों और मूल्यों पर अडिग रहने में मदद करता है। स्वाभिमानी व्यक्ति कभी भी गलत के आगे नहीं झुकता है, लेकिन वह दूसरों की बात को भी सम्मान देता है।
दूसरी ओर, अभिमान एक ऐसा गुण है जो हमें दूसरों को नीचा दिखाने और अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। अभिमानी व्यक्ति अपने अहंकार के पोषण के लिए दूसरों को कष्ट देना पसंद करता है। वह कभी भी अपने विचारों और मूल्यों पर सवाल उठने नहीं देता है और दूसरों की बात को भी सम्मान नहीं देता है।
इस प्रकार, स्वाभिमान और अभिमान दो अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। स्वाभिमान हमें सत्य के पक्ष में खड़े रहने और अपने आत्मसम्मान को बनाए रखने में मदद करता है, जबकि अभिमान हमें दूसरों को नीचा दिखाने और अपने अहंकार को बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। हमें स्वाभिमान को अपनाना चाहिए और अभिमान से बचना चाहिए।
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