आत्म-विजय: सबसे बड़ी जीत
संपादकीय:@हरेश पंवार
*आत्म-विजय: सबसे बड़ी जीत*
जीवन में बहुत सी चुनौतियां ही शत्रु बन जाती हैं, लेकिन याद रखे सबसे बड़ा शत्रु हमारा अपना स्वयं का व्यवहार होता है। हमारे कुसंस्कार, बुरी आदतें, कुविचार और आचरण आदि हमारे असली शत्रु होते हैं। इन शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना सबसे कठिन एवं दुरूह कार्य है, लेकिन यही वास्तविक जीत है। यदि मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
यह मानव का स्वभाव ही है कि दूसरों का दोष तुरंत हमें दिखाई दे देता है, जबकि खुद के दोषों के प्रति हम आंखें मूंद लेते हैं।
कहते हैं कि जिसने खुद को जीत लिया, उसने सारी दुनिया जीत ली । अपने ऊपर विजय प्राप्त करने वाले को सबसे बड़ा योद्धा माना गया है । मनुष्य का असली शत्रु तो वह स्वयं ही है । वस्तुतः हमारे असली शत्रु हमारे कुसंस्कार, हमारी बुरी आदतें, हमारे कुविचार और हमारा आचरण आदि ही हैं ।
दूसरों का दोष हमें तुरंत दिखाई दे देता है, जबकि अपने दोषों के प्रति हम अपनी आंखें मूंदे रहते हैं, यदि हम अपने व्यसनों, दुर्गुणों, चारित्रिक दोषों का परिमार्जन कर सकें, अपने कुसंस्कारों पर विजय प्राप्त कर सकें, तो हम असली विजेता हैं। इन शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना सबसे कठिन एवं दुरूह कार्य है, इन्हें पराजय करने वाला ही वास्तविक विजेता है ।
हम अक्सर दूसरों के दोषों को तुरंत देख लेते हैं, लेकिन अपने स्वयं के दोषों को देखने से बचते हैं। यह हमारी एक बड़ी कमजोरी है। हमें अपने स्वयं के दोषों को स्वीकार करना चाहिए और उन पर काम करना चाहिए।
उदाहरण के लिए, यदि हमें अपनी बुरी आदतों को बदलना है, तो हमें पहले उन आदतों को स्वीकार करना होगा और फिर उन पर काम करना होगा। यदि हम अपने कुविचारों को बदलना चाहते हैं, तो हमें पहले उन विचारों को स्वीकार करना होगा और फिर उन पर काम करना होगा।
आत्म-विजय प्राप्त करने के लिए, हमें अपने स्वयं के दोषों को स्वीकार करना होगा और उन पर काम करना होगा। हमें अपने कुसंस्कारों, बुरी आदतों, कुविचार और आचरण आदि पर विजय प्राप्त करनी होगी। यह एक कठिन कार्य है, लेकिन यही वास्तविक जीत है।
जैसा कि कहा गया है, "जिसने खुद को जीत लिया, उसने सारी दुनिया जीत ली।" आत्म-विजय प्राप्त करने के लिए, हमें अपने स्वयं के दोषों को स्वीकार करना होगा और उन पर काम करना होगा। यह एक कठिन कार्य है, लेकिन यही वास्तविक जीत है।
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