जीवन की सच्चाई: सुख, दुख

संपादकीय: 
 *"जीवन की सच्चाई: सुख, दुख"* 
24 जनवरी 2025
सुख कभी तो दुख कभी-कभी, ये संसार की रीत है। आज जिसकी हर है, तो कल उसकी जीत है। कौन है इस दुनिया में जिस पर काली घटा छाई नहीं, क्या राम और घनश्याम पर ऐसी विपता आई नहीं। धूप छांव तो रंग है, वही सुख दुख भी रंग मंच है। जीवन में जिसके हिस्से में जो आया है वही अभिनय करता चले। निश्चित मानिए आज दुख है तो कल सुख भी होगा।
जीवन एक अनोखा और जटिल अनुभव है, जिसमें हमें सुख और दुख दोनों का सामना करना पड़ता है। अक्सर हम सुख की तलाश में रहते हैं और दुख से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जीवन में सुख और दुख दोनों ही जरूरी होते हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

प्रकृति ने हमें इतना दिया है, लेकिन हम उसका धन्यवाद नहीं करते हैं। इसके बजाय, हम जो नहीं मिला है, उसके लिए अन्याय की शिकायत करते रहते हैं। यह हमारी मानसिकता को दर्शाता है कि हम जीवन में क्या चाहते हैं और क्या नहीं चाहते हैं।

कभी शांत बैठकर सोचना चाहिए कि हम मंदिर में परमात्मा के लिए जाते हैं या खुद के लिए। क्या हम जीवन में सुख और दुख दोनों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? या हम केवल सुख की तलाश में रहते हैं और दुख से बचने की कोशिश करते हैं?

जीवन में सुख और दुख दोनों ही जरूरी होते हैं, जैसे कि बारिश और धूप दोनों के मिलने से इंद्रधनुष बनता है। वैसे ही खूबसूरत जिंदगी के लिए सुख और दुख दोनों ही जरूरी होते हैं।

इसलिए, हमें जीवन में सुख और दुख दोनों को स्वीकार करना चाहिए। हमें दुख को ठुकराना नहीं चाहिए, बल्कि हमें उसे स्वीकार करना चाहिए और उससे सीखना चाहिए। हमें सुख को भी स्वीकार करना चाहिए और उसका आनंद लेना चाहिए।

इसके अलावा, हमें यह भी सीखना चाहिए कि जहां पर इज्जत नहीं है, वहां से उठकर जाना चाहिए। हमें अपने आत्म-सम्मान को बनाए रखना चाहिए और अपने जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए काम करना चाहिए।

अंत में, हमें यह याद रखना चाहिए कि लाड और प्यार एक उम्र तक मुफ्त में मिलता है, लेकिन उसके बाद उसे खुद ही कमाना पड़ता है। हमें अपने जीवन में सुख और दुख दोनों को स्वीकार करना चाहिए और अपने आत्म-सम्मान को बनाए रखना चाहिए।

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