बुद्धि और ज्ञान: दो अलग-अलग दृष्टिकोण
संपादकीय:
@11जनवरी2025
*"बुद्धि और ज्ञान: दो अलग-अलग दृष्टिकोण"*
जीवन में हमें कई बार यह देखने को मिलता है कि दो लोगों को एक ही गुरु से शिक्षा मिलती है, लेकिन दोनों के जीवन में इसका अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। यह इसलिए होता है क्योंकि हमारी बुद्धि और ज्ञान की ग्रहण करने की क्षमता अलग-अलग होती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
बुद्धि जब हड़ताल पर होती है तो जुबान ओवरटाइम काम करती हैं या ऐसे भी कह सकते हैं कि जिसकी बुद्धि ही विपरीत और विकृत है, वह चाहे जितना उपदेश सुन ले, उसकी मूढ़ता में बढ़ोतरी ही होगी। जिस गुरु से युधिष्ठिर ने शिक्षा पाई, उसी से दुर्योधन ने भी ज्ञानार्जन किया, लेकिन दोनों में रात और दिन का फर्क था।
ग्राह्मता (acceptability) की वजह से एक युधिष्ठिर बन गया और दूसरा दुर्योधन। विकृत मस्तिष्क से स्वीकार किया गया ज्ञान व्यक्ति की मोह-मूढ़ता को बढ़ाता है और सद्बुद्धि से ग्रहण किया गया ज्ञान अंतः करण के बंद दरवाजों को खोल देता है; उसे अन्तर्- दृष्टि का स्वामी बना देता है।
यह इसलिए होता है क्योंकि हमारी बुद्धि और ज्ञान की ग्रहण करने की क्षमता अलग-अलग होती है। विकृत मस्तिष्क से स्वीकार किया गया ज्ञान व्यक्ति की मोह-मूढ़ता को बढ़ाता है और सद्बुद्धि से ग्रहण किया गया ज्ञान अंतः करण के बंद दरवाजों को खोल देता है; उसे अन्तर्-दृष्टि का स्वामी बना देता है।
यहां, हमें यह समझने की आवश्यकता है कि ज्ञान की ग्रहण करने की क्षमता हमारी बुद्धि और मस्तिष्क की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। इसलिए हमें अपनी बुद्धि और मस्तिष्क को विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए, ताकि हम ज्ञान को सही तरीके से ग्रहण कर सकें और अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जा सकें।
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