मधुर व्यवहार और आत्म-निरीक्षण की महत्ता*
*संपादकीय-*
एडवोकेट हरेश पंवार@दैनिक भीम प्रज्ञा
8 जनवरी2025
*मधुर व्यवहार और आत्म-निरीक्षण की महत्ता*
कबीर दास जी ने बहुत सुंदर पंक्तियां में कहा कि - "ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होए। "मधुर वाणी से व्यवहार में निखार आता है और व्यक्ति के व्यक्तित्व में विकास होता है। एक बार जीभ ने दांतों से कहा भाइयों में आपके बीच रहती हूं। मुझे कभी काट मत देना। मेरी सुरक्षा का पुरा ख्याल रखना। दातों ने जवाब दिया बहन हम तो बने ही आपकी सुरक्षा के लिए है। लेकिन हमारा तू भी ख्याल रखना। कभी लप-लप करके अर्थात कड़वा बोलकर तू हमारे पीछे छुप जाए और बेचारे हमारे भाई चौक वाले दांतों को मत तुड़वा देना। बहन हमारी सलामती के लिए शब्द संयमित मधुर शब्द ही बोलना ताकि तुम्हारी यह मधुरता हमारी सुरक्षा कर सके। इसलिए कहा जाता है कि -
मधुर व्यवहार करना और मीठा बोलना एक कला है जो हरेक के पास नहीं होती। यह कला न केवल हमारे रिश्तों को मजबूत बनाती है, बल्कि हमारे जीवन को भी सकारात्मक दिशा में ले जाती है। इसलिए मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
आजकल के समय में, जब हमारे जीवन में इतनी व्यस्तता और तनाव है, मधुर व्यवहार करना और मीठा बोलना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। लेकिन यह चुनौती ही हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने का अवसर प्रदान करती है।
मधुर व्यवहार करने के लिए हमें अपने आप को निरीक्षण करने की आवश्यकता होती है। हमें अपने विचारों, अपने शब्दों और अपने कार्यों को निरीक्षण करना होता है। हमें यह समझना होता है कि हमारे विचार, शब्द और कार्य दूसरों पर क्या प्रभाव डालते हैं।
उदाहरण के लिए, जब हम किसी से बात करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि हमारे शब्द उस व्यक्ति पर क्या प्रभाव डालेंगे। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे शब्द मधुर और सौम्य हों, न कि कटु और अपमानजनक।
इसी तरह, जब हम किसी के साथ व्यवहार करते हैं, तो हमें यह समझना चाहिए कि हमारा व्यवहार उस व्यक्ति पर क्या प्रभाव डालेगा। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारा व्यवहार मधुर और सहायक हो, न कि कटु और अपमानजनक।
मीठा बोलना एक कला है जो हरेक के पास नहीं होता । हालांकि तेज़ बुद्धि और व्यवहार की बेहतरीन समझ बहुत कम लोगों में पाई जाती है । अगर हम सबसे अच्छे व्यवहार के बाद भी उनसे समकक्ष व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं तो वह गलती दूसरे की नहीं, बल्कि हमारे खुद की कहलायेगी ।
कहते हैं कि आत्मा और मन में हमेशा तकरार चलती रहती है, आत्मा परमार्थ की ओर जाना चाहती है और मन स्वार्थ की ओर ले जाना चाहता है । *हमेशा याद रखना, माता-पिता के साथ बितायें हुए मधुर पलों को सम्भाल कर रखना क्योंकि ये पल आपको याद तो आएंगे परंतु वापस नहीं आएंगे ।*
आत्म-निरीक्षण करने से हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने का अवसर मिलता है। हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि हमारे विचार, शब्द और कार्य दूसरों पर क्या प्रभाव डालते हैं। हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि हम अपने जीवन को कैसे बेहतर बना सकते हैं।
निष्कर्ष में, मधुर व्यवहार करना और मीठा बोलना एक कला है जो हरेक के पास नहीं होती। यह कला न केवल हमारे रिश्तों को मजबूत बनाती है, बल्कि हमारे जीवन को भी सकारात्मक दिशा में ले जाती है। आत्म-निरीक्षण करने से हमें अपने जीवन को बेहतर बनाने का अवसर मिलता है। हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि हमारे विचार, शब्द और कार्य दूसरों पर क्या प्रभाव डालते हैं। हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि हम अपने जीवन को कैसे बेहतर बना सकते हैं।
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