"सजगता और सचेतनता: साधना की चाबी"


संपादकीय: 
दैनिक भीम प्रज्ञा@एडवोकेट हरेश पंवार 
10जनवरी2025
 *"सजगता और सचेतनता: साधना की चाबी"* 

जीवन की यात्रा में हमें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इन चुनौतियों को पार करने के लिए हमें सजगता और सचेतनता की आवश्यकता होती है। सजगता और सचेतनता ही साधना की चाबी है, जो हमें जीवन की सच्चाई और सत्य का बोध कराती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है। 
संसारिक सागर को पार करना ही जीवन की साधना है। इंसान को तैरना आए तो पानी आनंद देता है और तैरना नहीं आए तो डूबो देता है।अग्नि का सही उपयोग करें तो अंधेरा मिटाती है, खाना बनाती है, नहीं तो आग लगा देती है। अपने जीवन में ज्ञान और अध्यात्म के द्वार सदा खुले रखिए।
सूरज दिन में उजाला देता है, चांद रात को उजाला देता है, परंतु जो ज्ञान के प्रकाश में जीता है, वह हर पल उजाले में ही जीता है। इसलिए सजगता और सचेतनता ही साधना की चाबी है। जीवन और सत्य का बोध ही आत्मज्ञान है। जो सजगता पूर्वक प्रत्येक कार्य को करता है, वह संसारिक सागर से पार लग जाता है, मुक्त हो जाता है, जीवन सुखमय हो जाता है ।

जैसे कि संसारिक सागर को पार करना ही जीवन की साधना है, वैसे ही हमें अपने जीवन में ज्ञान और अध्यात्म के द्वार सदा खुले रखने चाहिए। सूरज दिन में उजाला देता है, चांद रात को उजाला देता है, परंतु जो ज्ञान के प्रकाश में जीता है, वह हर पल उजाले में ही जीता है।

जीवन और सत्य का बोध ही आत्मज्ञान है। जो सजगता पूर्वक प्रत्येक कार्य को करता है, वह संसारिक सागर से पार लग जाता है, मुक्त हो जाता है, जीवन सुखमय हो जाता है। इसलिए सजगता और सचेतनता ही साधना की चाबी है, जो हमें जीवन की सच्चाई और सत्य का बोध कराती है।

निष्कर्ष में, सजगता और सचेतनता ही साधना की चाबी है। हमें अपने जीवन में ज्ञान और अध्यात्म के द्वार सदा खुले रखने चाहिए। जीवन और सत्य का बोध ही आत्मज्ञान है। इसलिए सजगता पूर्वक प्रत्येक कार्य को करना चाहिए, जिससे हम संसारिक सागर से पार लग जाएं और जीवन सुखमय हो जाए।

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