वृद्धावस्था में आदर और सम्मान की आवश्यकता।
संपादकीय
18 मार्च 2025।
*वृद्धावस्था में आदर और सम्मान की आवश्यकता।*
प्रकृति के जितने भी फल ज्यों ज्यों परिपक्व होते हैं उतने ही मधुर होते हैं, लेकिन बुढ़ापा एक ऐसा फल है जो जितना परिपक्व होता है उतना ही कड़वा लगता हैं। यह दुनिया की सच है कि बुजुर्गों के प्रति युवा पीढ़ी की वर्तमान भिन्न सोच भारत देश के लिए बड़ी चिंता का विषय है। जहां शिक्षा से पहले संस्कारों में बुजुर्गों के आदर्श सम्मान करने की भावना जन्म से ही लॉरियों में गीत ग-गाकर सुनाया जाता है। ताकि वृद्धावस्था में बच्चे उनकी सेवा कर सके।
"वृद्धावस्था जीवन का वह चरण है जब हम अपने अनुभवों और ज्ञान को आगे की पीढ़ियों के साथ बांटने का अवसर प्राप्त करते हैं।"
आज के भागदौड़ और आपाधापी भरे जीवन में, हम अपने बुजुर्गों को अक्सर उपेक्षा की निगाह से देखते हैं। वृद्धावस्था में बुजुर्गों को कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
वृद्धावस्था मानव जीवन का सबसे कड़वा फल है क्योंकि आज के भागदौड़, आपाधापी, अर्थ प्रधानता, नवीन चिंतन और मान्यताओं के युग में जिन अनेक विकृतियों, विसंगतियों और प्रतिकूलताओं ने जन्म लिया है, उन्हीं में से एक है वृद्धों की उपेक्षा । वृद्धावस्था तो वैसे भी अनेक शारीरिक व्याधियों, मानसिक तनावों और अन्याय व्यथाओ भरा जीवन होता है। ऐसे हालात में अगर परिवार के सदस्य विशेषकर युवा पीढ़ी परिवार के बुजुर्गो को अपमानित करें, उनका तिरस्कार कर मानसिक प्रताड़ित करें अथवा उनका ध्यान ना रखें तो स्वाभाविक है कि वृद्ध के लिए वृद्धावस्था अभिशाप बन जाती है। हालांकि, यह सच है कि आज भी भारत में बहुत से बुजुर्ग लोक-लाज के डर से अपने बच्चों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने से हिचकते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे अपने ही बच्चों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे तो परिवार का नाम खराब होगा, जमाना क्या कहेगा, बच्चे हमेशा के लिए उनसे दूर हो जाएंगे इत्यादि। वहीं, कुछ ज़ागरूकता की कमी के चलते चुपचाप बच्चों द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार को सहते रहते हैं। यह जानकर हैरानी होगी कि लगभग 30 प्रतिशत बुजुर्ग ही अपने साथ हो रहे गलत व्यवहार के खिलाफ कानूनी रास्ता अपनाते हैं। अगर इस समस्या से निजात पाना है तो हमारे बुजुर्गों को अपने साथ हो रहे गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज़ उठानी ही होगी।
यहां यह बात सोचने पर मज़बूर करती है कि क्या हमारे माता-पिता की ज़िम्मेदारी सरकार की है ? हमारा उनके प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं है। क्यों आधुनिकता की अंधी दौड़ में भागते हुए हम अपने कर्तव्यों व संस्कारों को भूलते जा रहे हैं? जब उन्होंने कभी हमें अकेला नहीं छोड़ा तो हम इतने स्वार्थी कैसे हो जाते हैं कि बिना कुछ सोचे- विचारे नि:सहाय अवस्था में उन्हें छोड़कर चले जाते हैं, जबकि हम सब को यह पता है कि वृद्धावस्था में बुजुर्गों को कई प्रकार की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस चकाचौंध दुनिया में आज का युवा यह भूल जाता है कि कल वह भी बूढ़ा होगा । वे अपने बुजुर्गों के योगदान को भूल जाते हैं, लेकिन समस्या की शुरुआत तब होती है, जब युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों को उपेक्षा की निगाह से देखने लगती हैं और उन्हें अपने बुढ़ापे व अकेलेपन से लड़ने के लिए असहाय छोड़ देते हैं। हालांकि कुछ संस्कारी युवा पीढ़ी सामाजिक मर्यादा व नैतिकता के आधार पर वृद्धों के प्रति आदर, आपसी प्रेम, संवेदना व सहानुभूति का अपना कर्तव्य अवश्य निभाते हैं । यथार्थ तो यह है कि वृद्ध समाज, परिवार व राष्ट्र का गौरव हैं।
बुजुर्गों की उपेक्षा एक बड़ी समस्या है, जिसका सामना हमारे समाज में कई लोग कर रहे हैं। यह समस्या न केवल बुजुर्गों के लिए, बल्कि समाज के लिए भी एक बड़ी चुनौती है।
हमें अपने बुजुर्गों के प्रति आदर, सम्मान और सहानुभूति का भाव रखना चाहिए। हमें उनकी जरूरतों को पूरा करने और उनके साथ सहानुभूति का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए।
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