फूले फिल्म: इतिहास की चुप्पियों को तोड़ती आवाज़"
संपादकीय
2 मई 2025
*"फूले फिल्म: इतिहास की चुप्पियों को तोड़ती आवाज़"*
"जहाँ अंधश्रद्धा अज्ञान को जन्म देती है, वहाँ ज्योतिबा फुले शिक्षा से क्रांति लाते हैं।"
हाल ही में प्रदर्शित फिल्म “फूले” समाज में न केवल चर्चा का विषय बनी, बल्कि अनेक वर्गों में हलचल पैदा कर दी है। यह फिल्म एक ऐसे युग की झलक देती है, जिसे इतिहास की मुख्यधारा ने प्रायः भुला दिया — और वह है सामाजिक सुधार, स्त्री शिक्षा, और जाति-विरोधी चेतना का युग। इस फिल्म के केंद्र में हैं महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले — जिन्होंने 19वीं सदी में वह अलख जगाई जो आज भी समाज को दिशा देती है। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
हालांकि कुछ संगठनों द्वारा इस फिल्म को लेकर विरोध दर्ज कराया गया है, किंतु हमें यह समझना होगा कि यह विरोध किसी फिल्म का नहीं, बल्कि एक कटु सत्य से टकराने का असहज अनुभव है। यह फिल्म किसी मज़हब, पंथ या समुदाय के विरुद्ध नहीं है, बल्कि उन रूढ़ियों और पाखंडों के खिलाफ है, जिन्होंने सदियों तक समाज को दो हिस्सों में बाँट रखा।
*फूले की विचारधारा: एक अंतहीन मशाल*
महात्मा फुले केवल सुधारक नहीं थे — वे विचार की एक धारा थे, जो आज भी बह रही है।
जब उन्होंने 1848 में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला, तब समाज में तूफान आ गया।
जब उन्होंने विधवा पुनर्विवाह, छूआछूत के विरोध और जातिगत समानता की वकालत की, तब उनके अपने समाज ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया।
जब सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा की मशाल हाथ में ली, तो उन्हें पत्थर, गोबर और गालियाँ झेलनी पड़ीं — लेकिन वे नहीं रुकीं।
ये वे लोग थे जिन्होंने सच बोलने का साहस दिखाया तब, जब झूठ पूजा जाता था।
फिल्म 'फूले' की सांस्कृतिक और वैचारिक उपलब्धियाँ
1. *छिपे इतिहास की पुनर्खोज:*
फिल्म हमें वह इतिहास दिखाती है जिसे सत्ता और वर्चस्व के संरक्षक अक्सर छिपाते रहे। यह केवल जीवनी नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है।
2. *शिक्षा का क्रांतिकारी स्वरूप:*
फूले के लिए शिक्षा केवल ज्ञान नहीं, मुक्ति का हथियार थी। फिल्म यह गहराई से दिखाती है कि शिक्षा कैसे सामाजिक अन्याय का प्रतिरोध बन सकती है।
3. स्त्री विमर्श का उभार:
सावित्रीबाई फुले का संघर्ष और योगदान आज की नारी चेतना के लिए पथप्रदर्शक है। फिल्म एक सशक्त संदेश देती है कि स्त्री को सशक्त बनाने का सबसे पहला रास्ता शिक्षा से होकर जाता है।
4. अंधविश्वास और पाखंड पर प्रहार:
फिल्म में ऐसे दृश्य हैं जो अंधविश्वास, धार्मिक पाखंड और जातिगत भेदभाव को कटघरे में खड़ा करते हैं — और यही बात कुछ लोगों को असहज कर रही है।
*विरोध क्यों? और समाधान क्या?*
कुछ समूहों द्वारा यह कहा गया कि फिल्म “धार्मिक भावनाओं को ठेस” पहुँचाती है। हमें समझना चाहिए कि जब कोई फिल्म समाज की विफलताओं को आईना दिखाती है, तो उसका उद्देश्य नफरत नहीं, जागरूकता होता है।
क्या हम इतना भी सहन नहीं कर सकते कि कोई हमें हमारे अतीत की ग़लतियाँ दिखा सके?
असल में विरोध उस सत्य से है जिसे हम देखना नहीं चाहते। लेकिन समाज तभी बदलता है जब वह खुद के अंधकार को पहचानने लगे।
अगर आज भी फुले जैसे विचारकों के प्रति ईमानदार न हो सकें, तो हमारा लोकतंत्र केवल एक दिखावा रह जाएगा।
*आज के भारत में फुले दर्शन की प्रासंगिकता*
1. जातिवाद आज भी जीवित है — बस उसका चेहरा बदल गया है। रंगभेद से लेकर स्कूलों में भेदभाव तक, फुले के विचार आज भी औषधि की तरह ज़रूरी हैं।
2. शिक्षा का निजीकरण और गरीब बच्चों की पहुँच से शिक्षा का बाहर होना एक नया अन्याय है, जिस पर फुले की सोच हमें चेतावनी देती है।
3. सामाजिक समता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए फुले विचार आज का सबसे ताकतवर औजार हो सकता है।
"फूले" केवल फिल्म नहीं है, वह आंदोलन है — सोच को झकझोरने वाला एक जीवंत दस्तावेज। यह फिल्म हमें न केवल इतिहास से जोड़ती है, बल्कि भविष्य के लिए दृष्टि भी देती है।
जो वर्ग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं, उन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए — कि क्या वे वाकई धर्म और संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं, या फिर पाखंड और अज्ञान की दीवारें बनाए रख रहे हैं?
हमें तय करना है —
हम इतिहास से सीखेंगे, या अंधकार को ओढ़कर बैठ रहेंगे?
"श्रमिक का पसीना, स्त्री की शिक्षा और दलित का स्वाभिमान — यही वो तीन धाराएं हैं, जिन्हें महात्मा फुले ने मिलाकर सामाजिक न्याय की नदी बहाई थी। आज हमें उसी जल से अपने समाज को सींचने की ज़रूरत है।"
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