"ऑपरेशन सिंदूर की नायिकाएं: क्रांति की उड़ान भरती बेटियां"

संपादकीय 
12मई 2025

*"ऑपरेशन सिंदूर की नायिकाएं: क्रांति की उड़ान भरती बेटियां"* 
जब राष्ट्र की सीमाएं खतरे में हों, तब देश की बेटियां मोर्चा संभालें — यही है भारत की असली शक्ति। ऑपरेशन सिंदूर में महिला अधिकारियों की भागीदारी ने देश को गर्व से भर दिया है। विंग कमांडर व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया कुरैशी की यह वीरता केवल सैन्य गौरव नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति की पुनरावृत्ति है। इन दोनों महिलाओं की जीवन यात्रा, उनके सामाजिक पृष्ठभूमि और संघर्ष, हमें सावित्रीबाई फुले, फातिमा बानो और डॉ. भीमराव अंबेडकर की दीर्घदृष्टि की याद दिलाते हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
     
   जब कभी इतिहास बदलता है, तो वह बंदूक की आवाज़ से नहीं, बल्कि हौसलों की गूंज और सोच की क्रांति से बदलता है। भारत की बेटियों ने ऑपरेशन सिंदूर में जिस अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया है, वह न केवल सैन्य इतिहास की गरिमा को बढ़ाता है, बल्कि सामाजिक चेतना के उस सोये हुए अध्याय को भी जागृत करता है, जो एक समय माता सावित्रीबाई फुले और फातिमा बानो के कंधों पर था। आज विंग कमांडर व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया कुरैशी उसी परंपरा की आधुनिक प्रतीक बनकर उभरी हैं — जहाँ राष्ट्रसेवा, सामाजिक जागृति और नारी सशक्तिकरण एक ही धारा में प्रवाहित हो रहे हैं।
भारतीय वायुसेना की विंग कमांडर व्योमिका सिंह और भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से न केवल आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक भूमिका निभाई, बल्कि भारत की बेटियों को यह संदेश भी दिया कि कोई भी सामाजिक दीवार उन्हें देश की रक्षा करने से नहीं रोक सकती।

व्योमिका सिंह, उत्तर प्रदेश की मूल निवासी हैं, जिनका बचपन सीमित संसाधनों में बीता। बताया जाता है कि वे एक अनुसूचित जाति समुदाय से आती हैं, जिसे लंबे समय तक सामाजिक उपेक्षा और अवसरों के अभाव का सामना करना पड़ा। लेकिन यह वही पृष्ठभूमि थी जिसने उनके भीतर आत्मबल और ऊंची उड़ान का सपना भर दिया।
इन दोनों नारियों की सफलता के पीछे एक अदृश्य शक्ति है — भारतीय संविधान और उसके निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर। बाबा साहब की दृष्टि ने एक ऐसा ढांचा तैयार किया, जिसमें व्योमिका सिंह और सोफिया जैसी बेटियां बिना किसी भेदभाव के अपने-अपने क्षेत्रों में नेतृत्व कर सकें। अगर सावित्रीबाई फुले ने नारी शिक्षा की मशाल जलाई थी, तो डॉ. अंबेडकर ने उसे संस्थागत स्वरूप दिया — आरक्षण, समानता और सामाजिक न्याय के रूप में।
आज सोशल मीडिया पर जो तुलना व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया की सावित्रीबाई और फातिमा बानो से की जा रही है, वह केवल भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक रूप से भी उचित है। यह वही परंपरा है जिसमें उपेक्षित समाज से आई महिलाएं न केवल अपने अधिकारों के लिए लड़ती हैं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए प्रेरणा बन जाती हैं।
विंग कमांडर व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया कुरैशी की यह यात्रा सिर्फ सैन्य मिशन की सफलता नहीं, सामाजिक बदलाव की दस्तक है। उनके साहस, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा में डॉ. अंबेडकर के सपनों का साक्षात दर्शन होता है। यह समय है जब हम केवल उन्हें सलामी न दें, बल्कि उनके पदचिह्नों पर चलकर भारत को एक समतामूलक, शिक्षित और सशक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।
"ये बेटियां सिर्फ देश की रक्षा नहीं कर रहीं, वे भविष्य का सामाजिक इतिहास भी लिख रही हैं।"

व्योमिका सिंह: की प्रतिभा ने जब परंपरा को छुआ तो भारत ने गर्व किया।
उत्तर प्रदेश से आने वाली विंग कमांडर व्योमिका सिंह सीमित संसाधनों और सामाजिक बाधाओं के बावजूद भारतीय वायुसेना की सबसे प्रखर महिला अधिकारियों में शामिल हुईं। उनके बारे में चर्चाएँ हैं कि वे अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से आती हैं — एक ऐसा वर्ग जिसे लंबे समय तक अवसरों से वंचित रखा गया। उनके जीवन की उड़ान, न केवल उनके अपने लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा है।
उनकी शादी हरियाणा के भिवानी जिले के 'बापोड़ा' (बापोरा) गांव में रहने वाले ग्रुप कैप्टन दिनेश सभरवाल से हुई है। यह गांव पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह का भी पैतृक स्थान है। दिनेश सभरवाल एक सैन्य परंपरा वाले अनुसूचित जाति वर्ग के परिवार से आते हैं, और वायुसेना में एक प्रतिष्ठित अधिकारी हैं। भिवानी और पूरे हरियाणा में व्योमिका सिंह को अब "बापोड़ा की बहू" कहकर सम्मान दिया जाता है।

कर्नल सोफिया कुरैशी: मुस्लिम महिला नेतृत्व का नया चेहरा
गुजरात की रहने वाली कर्नल सोफिया कुरैशी भारतीय सेना की पहली मुस्लिम महिला अधिकारी हैं जिन्होंने यूएन मिशन में बटालियन का नेतृत्व किया। वे पसमांदा मुस्लिम समुदाय से आती हैं, जिनमें आमतौर पर शिक्षा और सैन्य सेवा का प्रतिशत बहुत कम है। उन्होंने पारिवारिक और सामाजिक बाधाओं को तोड़ते हुए सैन्य क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

इन दोनों बेटियों की उपलब्धियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा निर्मित संविधान ने केवल कागज पर नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत में सामाजिक बराबरी का मार्ग प्रशस्त किया है। आज जब सोशल मीडिया पर व्योमिका और सोफिया की तुलना सावित्रीबाई फुले और फातिमा बानो से हो रही है, तब यह स्पष्ट होता है कि भारत एक नया सामाजिक युग देख रहा है — जहाँ बेटियाँ सिर्फ घर नहीं, राष्ट्र भी संभाल रही हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के वीरों में शामिल व्योमिका सिंह और सोफिया कुरैशी ने यह सिद्ध कर दिया है कि जाति, धर्म या वर्ग किसी की उड़ान को नहीं रोक सकते — जब हौसले ऊंचे हों और संविधान साथ हो। यह भारत की असली ताकत है — एकता, विविधता और समान अवसर।
"जब व्योमिका जैसे पंख हरियाणा की मिट्टी में लगते हैं, तो सामाजिक बदलाव की हवा हर कोने में पहुंचती है।"

Comments

Popular posts from this blog

संवैधानिक इस्तीफा या मजबूरी का मंथन – उपराष्ट्रपति धनखड़ का कदम और लोकतंत्र की गूंज

"भोजन की थाली में हमारी सभ्यता का आईना"

पचेरी की बहू नीलम सोनी ने अंग्रेजी विषय में किया नेट जेआरएफ क्वालिफाइड।