देश की सरहद और लोकतंत्र: तनाव के साये में राजनीतिक समीकरण

संपादकीय
14 मई 2025 

 *"देश की सरहद और लोकतंत्र: तनाव के साये में राजनीतिक समीकरण"* 
—"सरहदों पर बहुत तनाव है क्या, कुछ पता तो करो चुनाव है क्या"—प्रसिद्ध शायर डॉ. राहत इंदौरी ने अपनी विशिष्ट शैली में समसामयिक राजनीति और समाज पर कटाक्ष करते हुए वर्तमान परिदृश्य पर भी सवाल खड़ा करता है। आज की बदलती राजनीतिक और कूटनीतिक परिदृश्य में यह व्यंग्यात्मक पंक्ति सवाल से ज़्यादा एक सच्चाई सी लगती है। जब भी देश की सीमाओं पर हलचल या तनाव की खबरें प्रमुखता से उभरती हैं, तो एक वर्ग का ध्यान अनायास इस ओर जाता है—क्या देश में कहीं चुनाव हो रहे हैं? यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

यह सवाल यूं ही नहीं उठा। स्वतंत्र भारत के इतिहास में कई बार देखा गया है कि सीमा तनाव, आतंकी घटनाएं या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे, ठीक उसी समय मीडिया और राजनीतिक बहसों के केंद्र में लाए जाते हैं जब देश के किसी हिस्से में चुनावी प्रक्रिया चल रही होती है।
सरहद पर तनाव या सियासत की चाल? हाल ही में उत्तरी सीमाओं पर सैन्य गतिविधियों में तेजी, कुछ सीमावर्ती राज्यों में 'सुरक्षा कारणों' से इंटरनेट बंद होने की घटनाएं, और साथ ही मीडिया में सुरक्षा एजेंसियों की चेतावनियां प्रमुखता से छप रही हैं। दूसरी ओर देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव, निकाय चुनाव या आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियां भी ज़ोरों पर हैं।
इस संयोग ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में आंतरिक राजनीतिक लाभ साधे जा रहे हैं?

लोकतंत्र और भय का संतुलन
एक सजग लोकतंत्र में यह अपेक्षित है कि जनता को निर्णय लेने का पूरा अवसर मिले—बिना भय, बिना भ्रम और बिना भटकाव के। जब किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया (चुनाव) के दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा या युद्ध जैसे माहौल को प्रमुखता से उभारा जाता है, तो मतदाता का ध्यान बुनियादी मुद्दों—जैसे बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा—से हटकर राष्ट्रवाद और भावनात्मक फैसलों की ओर मुड़ जाता है। इससे चुनाव की दिशा और प्रकृति बदल जाती है।
यहां प्रश्न जो उठते हैं: क्या सीमा पर हर तनाव वाकई उतना बड़ा होता है, जितना प्रचारित किया जाता है? क्या सरकारें और पार्टियां सुरक्षा का मुद्दा चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही हैं?
क्या मीडिया स्वतंत्र रूप से इन विषयों की जांच करता है या केवल बयान दोहराता है?
सवाल यह भी उत्पन्न होता है कि उत्तरदायित्व किसका है? इस परिस्थिति में तीन पक्षों की भूमिका अहम हो जाती है:

1. सरकार की: उसे चाहिए कि वह सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों को चुनावी मंच की बजाय नीतिगत स्तर पर सुलझाए।
2. मीडिया की: समाचार और प्रचार में फर्क करे, और जनता को वस्तुनिष्ठ सूचना दे।
3. जनता की: वह भावनात्मक नहीं, विवेकपूर्ण निर्णय करे और सवाल पूछने का साहस रखे।
भारत जैसी लोकतांत्रिक और वैश्विक जिम्मेदारियों से भरी हुई व्यवस्था में यह ज़रूरी है कि 'सरहद का तनाव' और 'चुनावी प्रचार' के बीच की रेखा साफ रहे।
राष्ट्रवाद का मतलब केवल सीमा की रक्षा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी है।
देश की सीमाओं पर सच्चा बलिदान देने वाला जवान कभी नहीं चाहेगा कि उसके परिश्रम को राजनीति का औजार बनाया जाए।
समय आ गया है कि हम यह तय करें:
"हम किसके लिए युद्ध चाहते हैं – देश की सुरक्षा के लिए, या किसी चुनावी विजय के लिए?"

आज देश में "राष्ट्रवाद" एक राजनीतिक औजार बन गया है, जबकि "राष्ट्रभक्ति" एक भावनात्मक और निष्ठा से जुड़ा मूल्य है।जब सरकारें तिरंगा यात्रा निकालती हैं, तो उसका उद्देश्य अगर जनता को एकजुट करना है तो वह स्वागतयोग्य है। लेकिन जब इसी यात्रा के साथ विपक्ष पर हमले, विवादित बयान, और मीडिया हाइप जुड़ जाता है—तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
हाल के वर्षों में देखा गया है कि जब देश में कोई बड़ा चुनाव या सत्ता पर संकट आता है, उसी समय सीमाओं पर सैन्य गतिविधियाँ तेज़ हो जाती हैं, दुश्मन देशों की आलोचना उग्र हो जाती है,और मीडिया में "राष्ट्र एक है" जैसे नारों की गूंज बढ़ जाती है।यह सब एक साथ होना अगर बार-बार हो, तो यह केवल संयोग नहीं लगता।
सत्तारूढ़ दल या उससे जुड़े नेताओं द्वारा दिए गए विवादित बयान कभी-कभी इतनी तीव्रता से सामने आते हैं कि वो वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटका देते हैं जैसे बेरोजगारी, महंगाई, मीडिया की बहसों को भावनात्मक दिशा में मोड़ देते हैं
और विपक्ष को "राष्ट्रविरोधी" करार देने का अवसर प्रदान करते हैं।इससे आम नागरिक असली नीतियों और प्रदर्शन पर सवाल नहीं पूछता, बल्कि भावनाओं के आधार पर पक्ष चुनने लगता है। तिरंगा एक राष्ट्र का प्रतीक है, न कि किसी पार्टी की संपत्ति।यदि तिरंगा यात्रा: स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों में एकता और समझ फैलाए तो वह राष्ट्रभक्ति है। लेकिन अगर ये यात्रा केवल सत्ता का प्रदर्शन बन जाए,या इसका उपयोग मतदाता को भावनात्मक रूप से बांधने के लिए हो,
तो यह तिरंगे की आत्मा के विरुद्ध है। ऐसे समय में जब:चुनाव समीप हों,आर्थिक आंकड़े दबाव में हों, विपक्ष आक्रामक हो,और युवाओं में असंतोष बढ़ रहा हो,तब राष्ट्रवाद का उभार एक सामरिक 'डाइवर्जन टैक्टिक' के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
सरहद पर हलचल, देशभक्ति के नारे, और विपक्ष पर राष्ट्रविरोधी आरोप—ये सभी मिलकर एक राजनीतिक चाल का हिस्सा हो सकते हैं।
देशभक्ति तब पवित्र होती है जब वह निष्कलंक और स्वतः स्फूर्त हो। लेकिन जब उसका उपयोग राजनीतिक स्वार्थ, वोट बैंक और विरोध दबाने के लिए किया जाए, तो वह केवल प्रतीक बनकर रह जाती है।
आज समय की माँग है कि जनता सच और प्रचार में फर्क करे। सरहद पर शहीद होता जवान किसी पार्टी का नहीं, राष्ट्र का सच्चा रक्षक होता है।
उसके बलिदान को अगर चुनावी रैली में नारे या तिरंगा यात्रा की ओट में भुनाया जाए, तो यह राजनीति की सबसे खतरनाक दिशा बन सकती है।

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