भारत की नीति अमेरिका की ठेकेदारी नहीं, आत्मसम्मान है!’
संपादकीय
16मई 2025
*‘भारत की नीति अमेरिका की ठेकेदारी नहीं, आत्मसम्मान है!’*
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को जब कोई दूसरा देश—चाहे वह अमेरिका जैसा शक्तिशाली राष्ट्र ही क्यों न हो—यह बताने की कोशिश करे कि वह हमारे मसलों में मध्यस्थता करेगा, तो यह न केवल हमारी संप्रभुता पर हमला है, बल्कि हमारे आत्मसम्मान की परीक्षा भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत-पाक युद्धविराम को लेकर की गई ‘घोषणा’ और मध्यस्थता की पेशकश एक स्वतंत्र राष्ट्र के नीति-निर्माण में दखल देने का दुस्साहसिक प्रयास है, जिसे सिरे से अस्वीकार किया जाना चाहिए। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
भारत-पाक के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। दशकों से चले आ रहे सीमा विवाद, आतंकवाद और पाकिस्तानी फौज की नापाक हरकतों के बावजूद भारत ने सदैव संयम और समझदारी का परिचय दिया है। पर जब स्थिति हमारे सैनिकों को जवाबी कार्रवाई के लिए विवश करती है, तो वह भी हमारे संप्रभु अधिकार का ही हिस्सा है। फिर अचानक एक दिन अमेरिकी राष्ट्रपति यह घोषणा करते हैं कि भारत और पाकिस्तान अब युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। किसके कहने पर? किस अधिकार से? यह कौन-सी दोस्ती है, जिसमें दूसरा देश हमारी नीतियों की घोषणा पहले कर देता है और हमारी सरकार खामोश रहकर उन पर मौन सहमति देती प्रतीत होती है?
प्रधानमंत्री मोदी ने युद्धविराम शब्द का प्रयोग न सही, लेकिन जो कुछ सीमाओं पर घटा है, वह स्पष्ट रूप से एक सीजफायर ही है। इस निर्णय के पीछे भारत की सामरिक नीति क्या थी? क्या यह निर्णय विशुद्ध रूप से सैन्य रणनीति पर आधारित था, या इसमें अमेरिकी हस्तक्षेप की कोई भूमिका थी? इन प्रश्नों का उत्तर देशवासियों को चाहिए, और वह भी स्पष्ट शब्दों में।
हमें 1971 की याद दिलाई जाती है, जब हमारी सेनाएं लाहौर की दहलीज़ पर थीं, पाकिस्तानी सेना घुटनों के बल आ चुकी थी, और हमने युद्धविराम की घोषणा कर दी थी। 93,000 सैनिकों का आत्मसमर्पण कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी, परंतु तब भी राजनीतिक इच्छाशक्ति ने हमारी विजय को पूर्णता से वंचित कर दिया। आज भी वैसी ही स्थिति उत्पन्न हुई थी—पाक फौज को घुटनों पर लाने की क्षमता हमारी सेनाओं में थी, POK की ओर कदम बढ़ाए जा सकते थे, लेकिन सीजफायर ने उस संभावना पर पानी फेर दिया। और यह सब एक ऐसे समय पर हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावी रैलियों में यह दावा कर रहे हैं कि वे दुनियाभर के युद्ध 24 घंटे में समाप्त कर सकते हैं।
यह न तो अमेरिका की कूटनीतिक सफलता है, न ही यह भारत की पराजय है—यह हमारे आत्मनिर्णय पर संकट की आहट है। अमेरिकी व्यापार दबाव, रणनीतिक साझेदारी और 10 लाख करोड़ के व्यापारिक संबंध हमारे लिए महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन वे हमारी संप्रभुता के ऊपर नहीं हो सकते। यदि व्यापार की आड़ में कोई राष्ट्र हमें युद्धविराम के लिए बाध्य कर सकता है, तो यह भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
डोनाल्ड ट्रंप को किसने यह अधिकार दिया कि वे कश्मीर समस्या को सुलझाने की ‘ठेकेदारी’ लें? भारत ने सदैव यह स्पष्ट किया है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इस पर कोई तीसरा पक्ष, चाहे वह मित्र ही क्यों न हो, मध्यस्थ नहीं बन सकता। शिमला समझौता और लाहौर घोषणापत्र इस बात के साक्षी हैं। ट्रंप की इस बयानबाज़ी से न केवल भारतीय जनभावनाएं आहत हुई हैं, बल्कि यह भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांतों के साथ भी अन्याय है।
आज आवश्यकता है एक स्पष्ट, निर्भीक और दृढ़ बयान की—न केवल विदेश मंत्रालय से, बल्कि प्रधानमंत्री से भी। भारत को बताना होगा कि हम न किसी की कठपुतली हैं, न किसी की रणनीतिक बिसात पर मोहरा। हमारी नीति हमारी संसद, हमारी जनता और हमारे संविधान से तय होती है, न कि वाशिंगटन के गलियारों से।
हमें यह भी समझना होगा कि वैश्विक मंच पर मित्रता का अर्थ आत्मसमर्पण नहीं होता। सहयोग का अर्थ है समानता, सम्मान और संप्रभुता का परस्पर स्वीकार। जब यह संतुलन टूटता है, तब ठेकेदारी की बू आती है, और भारत उसे कभी स्वीकार नहीं करेगा।
यह वक्त मौन रहने का नहीं, आत्मसम्मान की पुनः स्थापना का है। भारत को दुनिया को यह बता देना चाहिए—हम अपने निर्णय स्वयं लेते हैं, और हमारे आंतरिक मामलों में किसी विदेशी शक्ति का हस्तक्षेप न आज स्वीकार था, न कल होगा।
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