"नफरत की जुबान और लोकतंत्र का अपमान"
संपादकीय -
17मई2025
*"नफरत की जुबान और लोकतंत्र का अपमान"*
जब देश आतंक के विरुद्ध खड़ा हो, जब वीर जवान सीमा पर जान की बाज़ी लगाकर दुश्मन को सबक सिखा रहे हों, तब किसी भी राष्ट्रभक्त नागरिक की प्रतिक्रिया गर्व, एकजुटता और शांति की कामना होनी चाहिए। लेकिन हालिया पहलगाम आतंकी हमले के बाद जो दृश्य सामने आए, वे न केवल दुर्भाग्यपूर्ण हैं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना और मानवीय मर्यादाओं के लिए चुनौती भी हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।
एक ओर जहाँ भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन सिंदूर' के माध्यम से दुश्मन को माकूल जवाब दिया, वहीं दूसरी ओर ट्रोल्स की 'नफरती सेना' ने सोशल मीडिया को जहरीले विमर्श का अखाड़ा बना डाला। वे देश की एकजुटता की बात करने वालों को निशाने पर लेने लगे — चाहे वह विदेश सचिव विक्रम मिसरी हों, ओलंपिक विजेता नीरज चोपड़ा, या उस वीर सैनिक की विधवा हिमांशी नरवाल जिन्होंने कश्मीरियों के विरुद्ध नफरत फैलाने से मना किया। यह विडंबना है कि देश के लिए प्राण देने वालों के परिजनों को भी सोशल मीडिया के नफरत के बाजार में तौल दिया जाता है।
लेकिन इस विकृति की पराकाष्ठा तब हुई, जब मध्य प्रदेश के आदिवासी कल्याण मंत्री विजय शाह ने सेना की महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ न केवल अपमानजनक, बल्कि संप्रदायिक रंग से सनी टिप्पणी कर दी। एक मंत्री से ऐसी अपेक्षा कतई नहीं की जा सकती, विशेष रूप से तब जब देश एकता और संयम की जरूरत के दौर से गुजर रहा हो।
विडंबना यह रही कि यह आपत्तिजनक बयान मीडिया में आते ही तूल पकड़ गया, परंतु राज्य सरकार की ओर से स्वतः कोई कड़ा कदम नहीं उठाया गया। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद ही एफआईआर दर्ज की गई और सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद मंत्री को खेद प्रकट करना पड़ा। लेकिन सवाल यह है—क्या खेद जताना ही पर्याप्त है? क्या यह बयान कोई भूल थी, या उस राजनीतिक प्रवृत्ति का हिस्सा जो तात्कालिक वोटों की राजनीति के लिए समाज में ज़हर घोलने से भी नहीं हिचकती?
इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा नेतृत्व की चुप्पी भी उतनी ही चिंताजनक है। ऐसे मामलों में निर्णायक कार्रवाई न करके पार्टी एक खतरनाक संकेत देती है—कि वोटबैंक की राजनीति, मूल्यों और मर्यादा से ऊपर है। यदि कोई मंत्री सशस्त्र बलों और महिलाओं के प्रति अपमानजनक भाषा का प्रयोग करता है, तो उसे केवल खेद से नहीं, मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए।
देश की न्यायपालिका ने इस मामले में जो रुख अपनाया है, वह न केवल मिसाल है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—न्यायिक विवेक—की जीवंतता का प्रमाण भी है। परंतु अदालतों से पहले यह विवेक नेताओं और पार्टियों में जागना चाहिए। देश को इस समय राजनीति में संयम, भाषा में मर्यादा और सार्वजनिक जीवन में अनुशासन की आवश्यकता है।
ट्रोल आर्मी हो या मंत्री, दोनों को यह समझना होगा कि नफरत, राष्ट्रभक्ति का पर्याय नहीं है। आलोचना और सवाल राष्ट्रविरोध नहीं हैं। और सबसे अहम—किसी की जाति, धर्म या लिंग को लक्ष्य बनाना सिर्फ असंवेदनशीलता नहीं, अपराध है।
समय आ गया है कि देश तय करे—हम नफरत के शोर में चुप रहेंगे या लोकतंत्र की मर्यादा के लिए मुखर होंगे। यह केवल एक मंत्री की गलती नहीं, हमारी सामूहिक चेतना की परीक्षा है।
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